सूप पटकने से नहीं, सतकर्म और संघर्ष से दूर होती है दरिद्रता, भागवत कथा के समापन पर गूंजा प्रेरक संदेश

Rajesh Thakur | Haveli Kharagpur

हवेली खड़गपुर के नाथ स्थान (सिंहपुर) में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन बुधवार को भक्ति के साथ-साथ सामाजिक चेतना का भी सशक्त संदेश सामने आया। कृष्ण-सुदामा प्रसंग का मार्मिक वर्णन करते हुए कथावाचक श्री रामभद्राचार्य जी महाराज (हिमालयन बाबा) ने दरिद्रता और अंधविश्वास के मुद्दे पर दो टूक बात रखी। उन्होंने साफ कहा कि दरिद्रता सूप पटकने से नहीं जाती, बल्कि सतकर्म, मेहनत और संघर्ष से दूर होती है। उनके इस कथन ने कथा पंडाल में मौजूद श्रद्धालुओं को सोचने पर मजबूर कर दिया।

दरअसल, बिहार समेत कई राज्यों में दिवाली के अगले दिन ब्रह्ममुहूर्त में टूटे हुए सूप को सड़क पर पटकने की एक परंपरा प्रचलित है, जिसे दरिद्रता भगाने से जोड़ा जाता है। इसी संदर्भ में कथावाचक ने इस परंपरा को अंधविश्वास करार देते हुए कहा कि समाज को अब जागरूक होने की जरूरत है। उन्हें अंधविश्वास व सुनी-सुनाई बातों पर नहीं जाना चाहिए। इन सबसे केवल समय की बर्बादी है। कथावाचक ने एक रोचक उदाहरण देते हुए कहा कि संभवतः किसी समय किसी महिला ने घर में छुछूंदर को भगाने के लिए सूप पटका होगा और मजाक में कह दिया होगा कि दरिद्रता भगा रहे हैं। धीरे-धीरे वही बात परंपरा बन गयी। उन्होंने इसे ‘एक कुत्ते के भौंकने पर पूरे मोहल्ले के कुत्तों के भौंकने’ वाली कहावत से जोड़ते हुए बताया कि कैसे बिना सोचे-समझे समाज में मान्यताएं फैल जाती हैं।

कृष्ण-सुदामा प्रसंग के जरिए कथावाचक श्री रामभद्राचार्य जी महाराज (हिमालयन बाबा) ने यह भी समझाया कि सच्ची समृद्धि मित्रता, सादगी, परिश्रम और सद्विचार में निहित है। भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की कथा का सार यही है कि ईमानदारी और संघर्ष से जीवन बदलता है, न कि बाहरी दिखावे या कर्मकांड से। कथा के अंतिम दिन यह संदेश श्रद्धालुओं के बीच गूंजता रहा कि समाज को अंधविश्वास से ऊपर उठकर कर्म और विचार की शक्ति को अपनाना होगा, तभी वास्तविक दरिद्रता दूर होगी और जीवन में समृद्धि आएगी। बता दें कि श्रीमद्भागवत कथा का आगाज 2 अप्रैल से शुरू हुआ है और आज उसका समापन हुआ।

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