Aatma Babu RIP : आखिर निधन के जस्ट पहले क्या लिखा था आत्मा बाबू ने, मुखियाजी डॉट कॉम पर पढ़ें Exclusive Report

Rajesh Thakur | Patna

जीवन के अंतिम क्षणों में मनुष्य क्या चाहता है- यह प्रश्न जितना दार्शनिक और आध्यात्मिक है, उतना ही मानवीय भी। मुंगेर के आत्मानंद सिंह उर्फ ‘आत्मा बाबू’ के मामले में इसका उत्तर अब शब्दों में सामने है। उनके निधन से ठीक पांच दिन पहले अपने पौत्र मन्नू सिंह को लिखा गया एक संदेश परिजनों ने विश्वास के साथ साझा किया है। यह संदेश न केवल उनकी निजी आस्था का दस्तावेज है, बल्कि ‘मोक्ष’ की उस अवधारणा को भी जीवंत करता है, जो भारतीय अध्यात्म की मूल आत्मा रही है। यदि उनका किशोर पौत्र मन्नू सिंह किसी को नहीं बताता तो आत्मा बाबू के लिखे शब्दों के बारे में किन्हीं को जानकारी भी नहीं मिल पाती। लोग यह जान भी नहीं पाते कि उन्होंने अपने ‘मोक्ष मार्ग’ को किस कदर ‘तय’ कर रखा था। परमात्मा ने उन्हें अपने में ‘लीन’ कर लेने की ‘स्वीकृति’ दे रखी थी। लोग भगवान के श्री चरणों में स्थान पाने के लिए कितनी मिन्नतें करते हैं, कितनी मन्नतें मांगते हैं, लेकिन यहां तो परमात्मा ने मोक्ष का पूरा रुट चार्ट उनके एक इशारे पर फइनल कर दिया था और अब जाकर इससे जुड़े तार सामने आ रहे हैं। खास बात कि आत्मा बाबू ने खुद के लिए ही नहीं, बल्कि उनके दिलों में वास करने वाले सभी लोगों के लिए भी मोक्ष की कामना की है। और यह सभी जानते हैं कि उनके दिलों में घर के लोगों से ज्यादा मजदूर वर्ग वास करते थे। उनके सबसे बड़े शुभचिंतक थे।

दरअसल, आत्मा बाबू का अपने 15 वर्षीय पौत्र मन्नू सिंह से काफी लगाव था। वे अपने मन की बात अपने पुत्र संजीव सिंह से ज्यादा अपने पौत्र मन्नू से ही करते थे। 10 मार्च को जब आत्मा बाबू ने एक कागज के टुकड़े पर परमात्मा, अध्यात्म, मोक्ष आदि से जुड़ी बातें लिखकर व्हाट्सअप पर भेजी तो वह बहुत गंभीरता से नहीं लिया था। यह उसके बालमन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी। तब किसी ने इसकी कल्पना भी नहीं की थी कि उनकी लिखी यह चंद पंक्ति उनके ‘मोक्ष धाम’ में सीट सुरक्षित करने का ‘आवेदन’ है। 14 मार्च को जब घटना हुई, तब पता चला कि उनके लिखे शब्दों में तो जीवनभर का अध्यात्म छिपा है। यह संदेश केवल अंतिम समय की भावुक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक आध्यात्मिक साधना का सार प्रतीत होता है। ‘काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह’ जैसे बंधनों से मुक्ति की स्पष्ट कामना यह संकेत देती है कि आत्मा बाबू के लिए अध्यात्म केवल विचार नहीं, जीवन व्यवहार का हिस्सा था। कागज में लिखे ‘नश्वर शरीर’, ‘पाप-कुकर्म’ और ‘मुक्ति’ जैसे शब्द आत्मस्वीकृति की उस अवस्था को दर्शाते हैं, जहां व्यक्ति अपने जीवन का निष्पक्ष मूल्यांकन करता है। भारतीय दर्शन और अध्यात्म में जिसे अंतिम जागरण कहा गया है।

यह लिखी पंक्तियों की जानकारी तब मिली, जब उनकी शव यात्रा के दौरान पुत्र संजीव सिंह ने रिश्तेदारों को बताया। दरअसल, आत्मानंद सिंह का निधन 14 मार्च की आधी रात को पटना के मेदांता अस्पताल में इलाज के दौरान हुआ था। 13 मार्च को हवेली खड़गपुर स्थित अपने पैतृक घर पर उनकी तबियत बिगड़ी थी। 15 मार्च की सुबह उनका पार्थिव शरीर मेदांता से खड़गपुर लाया गया। लगभग तीन बजे उनका पोता मन्नू दिल्ली से वाया देवघर होते हुए खड़गपुर पहुंचा। फिर शाम में शिव नगरी बनारस के लिए आत्मा बाबू की शव यात्रा निकली। पटना से ठीक पहले जब बख्तियारपुर में काफिला रुका था, तब बातचीत के क्रम में संजीव सिंह ने अपने पिता की लिखी बातों की जानकारी दी। उनके संदेश का सबसे प्रमुख पक्ष है- मोक्ष की स्पष्ट कामना। यहां मुक्ति केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक भावना के साथ व्यक्त हुई है। ‘मेरे मनः ह्रदय में वास करने वाले लोगों’ के लिए भी मोक्ष की प्रार्थना, भक्ति परंपरा के उस विस्तार को दर्शाती है, जहां व्यक्ति अपनी मुक्ति के साथ दूसरों के कल्याण की कामना करता है। यह ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा है, जिसे भारतीय संत परंपरा में आध्यात्मिक उत्कर्ष का संकेत माना गया है। फिर भारतीय दर्शन में ‘मोक्ष’ को जीवन का अंतिम लक्ष्य माना गया है। भगवद गीता में भगवान कृष्ण ने युद्धभूमि में अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा कि जब मनुष्य कर्म के फल के मोह से मुक्त होकर परमात्मा में समर्पित हो जाता है, तभी वह जन्म-मरण के चक्र से छूटता है। इसी प्रकार गौतम बुद्ध ने ‘निर्वाण’ और महावीर स्वामी ने ‘कैवल्य’ के माध्यम से इसी मुक्ति को अलग-अलग रूपों में व्याख्यायित किया है। आत्मा बाबू के शब्द इन सभी परंपराओं के साथ एक गहरा साम्य स्थापित करते दिखाई देते हैं।

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उल्लेखनीय है कि आत्मा बाबू का निधन पापमोचिनी एकादशी के दिन हुआ, जबकि उनका दाह संस्कार काशी के मणिकर्णिका घाट पर संपन्न हुआ। इसके बाद कर्मकांड की प्रक्रिया रामनवमी और चैत्र नवरात्र जैसे पवित्र कालखंडों में पूर्ण हुई। इस क्रम ने उनके अंतिम संदेश को और अधिक अर्थपूर्ण बना दिया है, मानो शब्द और घटनाएं एक ही आध्यात्मिक समयचक्र में साथ-साथ घटित हो रही हों। उनके इस संदेश को अब केवल एक निजी दस्तावेज के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि यह उन सवालों का उत्तर भी बन गया है, जो उनके निधन के बाद लोगों के मन में उठ रहे थे कि उन्होंने अपने अंतिम समय में क्या सोचा और किस भाव के साथ इस दुनिया को विदा कहा। अब, जब उनके अपने शब्द सामने हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि उनका अंतिम चिंतन सांसारिक नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण की अवस्था का था। आत्मानंद सिंह उर्फ ‘आत्मा बाबू’ का जीवन भले समाप्त हो गया हो, लेकिन उनका यह संदेश एक ऐसी आध्यात्मिक विरासत के रूप में सामने आया है, जो लंबे समय तक स्मरण किया जाएगा। मृत्यु यहां विराम नहीं, बल्कि एक वापसी का संकेत बनकर उभरती है, जहां आत्मा, अपने मूल स्रोत में लीन हो जाती है।

अब बताते हैं कि आत्मा बाबू ने अपने पोते मन्नू को आखिर लिखा क्या था। उनका अक्षरशः अंतिम प्रार्थना- ‘हे वासुदेव! कृष्ण मुरारी! आप मुझे मेरे सात जन्मों के कर्मों (काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह) के बंधनों से मुक्त करें। इस नश्वर शरीर से मैंने आपकी जगत (सृष्टि) में जो भी वाणी द्वारा झूठ और आपके दिये हुए शरीर से जो भी पाप, कुकर्म हुए हों, उससे हे नाथ गोविंद मुझे मुक्त करें और अंत समय में आप शेषनाग शैय्या पर माँ लक्ष्मी सहित अपने संपूर्ण सखा (ब्रह्मा, शिव, नारद, गरुड़ एवं देवी-देवताओं) मेरे मुख-नेत्र में वास करें और अपने इस तुच्छ दास सहित मेरे मनः ह्रदय में वास करने वाले लोगों को मोक्ष प्रदान करने की कृपा करें। ॐ नमो नारायणा नमः। ॐ ॐ ॐ।’ ‘हे नाथ गोविंद! अंत समय में मेरे अपने पराये सभी सखा से और अपनी मोह माया से इस दास को मुक्त करें। मेरे अंदर से निकली आत्मा को अपने अंतरह्रदय में लीन कर लें।’

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