Mukhiyajee Reporter | Patna
शारदीय नवरात्र के साथ घर-घर में माता की आराधना शुरू हो गयी है। इस अवसर पर वेदाचार्य एवं ज्योतिष दैवज्ञ ब्रजेश मिश्र ने कहा कि नवरात्र केवल नौ रात्रियों का पर्व नहीं है। यह मनुष्य के भीतर सोई शक्ति को जगाने, अज्ञान का नाश करने और चेतना के प्रकाश की ओर बढ़ने का महापर्व है। उन्होंने कहा कि शरद ऋतु में वर्षा का आवरण हटता है और आकाश निर्मल हो जाता है। उसी समय साधक को भी बाहरी कोलाहल से हटकर आत्मचिंतन का अवसर मिलता है। उन्होंने मुखियाजी डॉट कॉम से खास बातचीत में बताया कि शारदीय नवरात्र की शाक्त उपासना का प्रमुख आधार मार्कण्डेय पुराण में समाहित देवी माहात्म्य है, जिसे दुर्गासप्तशती या चण्डीपाठ भी कहते हैं। इसके पाँचवें अध्याय में देवी को सभी प्राणियों में चेतना, बुद्धि, क्षुधा, शक्ति, श्रद्धा और मातृभाव के रूप में नमन किया गया है।


उन्होंने प्रसिद्ध स्तुति का स्मरण कराया, ‘या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥’ इसका भावार्थ है कि जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान हैं, उन भगवती को बारम्बार नमस्कार है। उन्होंने कहा कि शक्ति का अर्थ केवल युद्ध जीतने की क्षमता नहीं है। विचार करने की शक्ति, सत्य बोलने का साहस, अन्याय का प्रतिरोध, दुखी के प्रति करुणा और संकट में धैर्य भी उसी शक्ति के रूप हैं। महिषासुर वध की कथा की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इसे केवल पौराणिक युद्ध न मानकर एक गहरे प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है। कथा में महिषासुर अहंकार और आसुरी शक्ति का प्रतिनिधि है। आत्मचिंतन की दृष्टि से देखें तो हर मनुष्य के भीतर अहंकार, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या, छल और अपनी इच्छाओं को ही सर्वोच्च सत्य मान लेने की प्रवृत्ति के रूप में अनेक महिषासुर बैठे हैं।

आचार्य के अनुसार इन विकारों का अंत केवल बाहरी अनुष्ठानों से नहीं होता। इसके लिए आत्मनिरीक्षण, विवेक, संयम और अपने दोष स्वीकार करने का साहस चाहिए। उन्होंने नौ देवियों के स्वरूपों को साधना की नौ प्रेरणाओं के रूप में समझाया। उन्होंने कहा कि शैलपुत्री स्थिरता, ब्रह्मचारिणी तप और अनुशासन, चन्द्रघण्टा साहस और कूष्माण्डा सृजनशीलता की प्रेरणा देती हैं। स्कन्दमाता वात्सल्य, कात्यायनी अन्याय के विरुद्ध शक्ति और कालरात्रि भय का सामना करने का सामर्थ्य सिखाती हैं। महागौरी शुद्धता और सिद्धिदात्री साधना की परिपक्वता की स्मृति दिलाती हैं। उन्होंने कहा कि पूजा के साथ यदि व्यवहार में धैर्य, विचारों में पवित्रता और कर्मों में न्याय आ जाए, तभी नवरात्र की प्रेरणा जीवन में उतरती है। उनका संदेश है कि बाहरी विजय तभी सार्थक है, जब मनुष्य अपने भीतर के अन्याय और अज्ञान पर भी विजय पाए।







