प्रतापगंज/छातापुर से राजेश ठाकुर
18 अगस्त…! कैलेंडर पर यह महज एक तारीख है, लेकिन कोसी के इलाके के लोगों के लिए यह तारीख आज भी किसी डरावने सपने की तरह है। एक ऐसा सपना, जिसे वे भूलना चाहते हैं, लेकिन भूल नहीं पाते। आज उस भयावह कोसी त्रासदी को 18 साल पूरे हो गए। 18 अगस्त 2008 को नेपाल के कुसहा के पास कोसी तटबंध टूटने के बाद नदी ने अपना रास्ता बदल लिया था। देखते ही देखते पानी ने बिहार के कोसी अंचल के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया। गांव के गांव डूबे, अनगिनत घर उजड़े, लाखों हेक्टेयर खेतों में लगी फसलें बर्बाद हुईं और हजारों परिवारों की जिंदगी अचानक बेघर और बेबस हो गयी। कभी जिस कोसी को लोग जीवन और समृद्धि की नदी मानते थे, उसी कोसी का रौद्र रूप उस दिन लोगों ने अपनी आंखों से देखा।
आज भी याद कर सिहर उठते हैं लोग : प्रतापगंज और छातापुर के उन इलाकों में आज भी जब 18 अगस्त का दिन आता है, तो 2008 की तस्वीरें लोगों की आंखों के सामने तैरने लगती हैं। किसी को वह रात याद है, जब पानी अचानक गांव की ओर बढ़ा था। किसी को अपना घर छोड़कर भागने की मजबूरी याद है। किसी को सिर पर गठरी रखे, बच्चों को गोद में उठाए सुरक्षित जगह की तलाश में भागते लोग याद हैं। और किसी को वह इंतजार याद है कि पता नहीं अगली सुबह घर बचेगा भी या नहीं। कुसहा त्रासदी ने सिर्फ मकान नहीं बहाए थे। उसने लोगों की जमा-पूंजी, खेतों की फसल, पशुधन, रोजगार और वर्षों की मेहनत को भी अपने साथ बहा लिया था। कई परिवारों के लिए वह दिन उनकी जिंदगी को दो हिस्सों में बांट गया। कई परिवार तो सदा-सदा के लिए विलीन हो गए।
जिंदगी ने फिर डेगा-डेगी चलना सीखा : बाढ़ का पानी धीरे-धीरे उतर गया। लोग फिर लौटे। टूटे घरों को खड़ा किया। खेतों में दोबारा खेती शुरू हुई। जिंदगी ने फिर धीरे-धीरे चलना सीखा। वह डेगा-डेगी ही सही, लेकिन आगे बढ़ने लगी। किंतु मन के भीतर बैठा डर शायद कभी पूरी तरह नहीं निकला। इसे निकलने में कई वर्ष लग गए। उस साल जन्म लेने वाले बच्चे अब युवा हो गए हैं। उस त्रासदी में भी खुशकिस्मती से बचे कितने ही बुजुर्ग उम्र की दीवार फांद कर इस लोक से उस लोक चले गए। संयोगवश उसी 18 अगस्त को वेब पोर्टल मुखियाजी डॉट कॉम के संपादक राजेश ठाकुर कोसी बेल्ट के प्रतापगंज और छातापुर पहुंचे। सड़कें सामान्य थीं। बाजारों में रोज की तरह चहल-पहल थी। जिंदगी अपनी रफ्तार से चल रही थी। लेकिन, कहीं न कहीं अपनी आँखों से इस खौफनाक मंजर को देखने वाले बुजुर्गों के मन में आज भी यादें ताजा हैं।
पत्रकारिता का कीड़ा कुलबुलाने लगा : जब हम छातापुर में थे तो आतिथ्य में लगे सुनील ठाकुर ने बताया कि आज ही कोसी बांध टूटा था। इतना सुनते ही मेरे अंदर में बसे पत्रकारिता का कीड़ा कुलबुलाने लगा। सुनील ठाकुर की वहां पर वर्षों से ज्वेलरी की दुकान है। बस मेरा इंटरव्यू वहीं से शुरू हो गया। दरअसल, मैं वहाँ बरतुहारी के लिए गया था। पटना के पाटलिपुत्र स्टेशन से 17 अगस्त की आधी रात में चला और 18 अगस्त की सुबह फारबिसगंज पहुंचा। वहां से बाइरोड छातापुर पहुंचा। दिनभर वहां रहने के बाद हमने नाइट होल्ट प्रतापगंज में किया। रिश्तेदारों से बातचीत में पता चला कि 18 अगस्त की त्रासदी के 18 साल हो गए। सुनील ठाकुर ने बताया कि उस भयावह रात को हमलोग कैसे भूल सकते हैं। 18 अगस्त को कुसहा बांध टूटा और 19 अगस्त की सुबह होते-होते निचले इलाकों में ही नहीं, बल्कि शहरी इलाकों में कमर भर से ऊपर पानी बहने लगा। छातापुर से प्रतापगंज जाने के दौरान अजय ठाकुर और प्रणव ठाकुर ने बताया कि उस समय हमलोग काफी छोटे थे, लेकिन समझदारी आ गयी थी। स्कूल जाते थे। घर के लोगों को चिंतित देखकर इतना तो जान ही गए कि यह घोर विपदा का समय है।




क्या कहते हैं वरीय पत्रकार विजय राज छाजेर : हिंदुस्तान अखबार के वरीय पत्रकार विजय राज छाजेर ने बताया कि 18 अगस्त की तारीख को भला कौन भूल सकता है। उन्होंने बताया कि हमें रात में अखबार के दफ्तर से सूचना मिली कि कुसहा बांध टूट गया है। इसके थोड़ी देर बाद तो चारों ओर इलाकों में यह बात फैल गयी। लोग बचने के लिए ऊंचे स्थानों पर पहुंचने लगे। हालांकि, हम अखबार से बंधे थे, इसलिए खतरों से खेलना हमारी मजबूरी भी थी। फिर हमें फोटो लेना शौक में शामिल था, इसलिए कैमरा लेकर सबसे पहले पहुंच जाते थे। रेलवे स्टेशन, NH आदि ही लोगों के लिए शरणस्थली बने हुए थे। एक-दो जगह तो ऐसा वाकया हो गया कि किसी तरह जान बचाकर भागना पड़ा। वे बताते हैं कि कोसी त्रासदी का दंश एक-दो माह नहीं, लोग वर्षों तक झेले। जिनका पूरा परिवार बह गया, उन्हें तो कोई देखने वाला नहीं है। लेकिन जिनके सगे-संबंधी बाढ़ में बह गए, किन्हीं के जिगर का टुकड़ा खत्म हो गया, सुहाग उजड़ गया, बच्चे अनाथ हो गए; वे परिवार आज 18 साल बाद भी उस त्रासदी को नहीं भूल पाएंगे। पत्रकार छाजेर ने उन दिनों हिंदुस्तान में कवरेज की गयी रिपोर्ट को भी हमें दिखाया। हमने मुखियाजी के पाठकों के लिए उसे मोबाइल में कैद कर लिया। फोटो में कैसे रेलवे की पटरी पर ट्रेन के बजाय जिंदगी सरक रही है, को कैद किया गया है।
बहरहाल, कोसी की त्रासदी अब इतिहास का हिस्सा है। नयी पीढ़ी का बड़ा हिस्सा शायद उस भयावहता को सिर्फ तस्वीरों और किस्सों में जानता है। लेकिन जिन लोगों ने उस पानी को अपने घरों में घुसते देखा था, जिन लोगों ने अपनों को खोया था, जिनके सामने उनकी जिंदगी भर की कमाई बह गयी थी, उनके लिए 18 अगस्त कोई इतिहास नहीं है। यह एक जिंदा स्मृति है। कोसी की धारा आज भले ही अपने रास्ते पर बह रही हो, लेकिन उसके किनारे रहने वालों के दिल में 18 अगस्त 2008 का वह सैलाब आज भी कहीं ठहरा हुआ है। और शायद इसीलिए 18 अगस्त आते ही कोसी बेल्ट के लोगों की आंखों में सिर्फ पानी नहीं, उस त्रासदी की पूरी तस्वीर उतर आती है। और हकीकत भी यही है कि 18 साल बाद भी कुसहा का जख्म भरा नहीं है, बस उसके ऊपर वक्त की एक परत जम गयी है।










