आंदोलन हारता नहीं, हाईजैक हो जाता है; पढ़ें वरीय पत्रकार अरविंद शर्मा की आँखन-देखी..! अन्ना हों या बिहार की कुर्मी चेतना रैली

Mukhiyajee Reporter | Delhi

देश की हिंदी पट्टी अभी NEET क्वेश्चन पेपर लीक को लेकर आंदोलनरत है। कक्रोच जनता पार्टी के बैनर तले पिछले माह भर से छात्रों का आंदोलन चल रहा है। पहले सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने वहां आमरण-अनशन शुरू किया, फिर उनकी स्थिति बिगड़ने लगी तो पुलिस ने इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया। इसी दौरान विपक्ष के नाम पर सबसे पहले वामदल पहुंचा। कल छात्रों का आंदोलन उग्र हो गया। वे सब घेराव करने संसद भवन पहुंच गए। आंदोलन ने रफ्तार पकड़ ली तो इसे लपकने के लिए राहुल गाँधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश सिंह यादव सहित अन्य नेता भी पहुंच गए। ऐसे में सवाल उठने लगा है कि छात्रों का यह आंदोलन कहीं हाईजैक तो नहीं हो रहा है। इस आंदोलन को निकट से समझने के लिए वरीय पत्रकार अरविंद शर्मा जंतर-मंतर पहुंच गए। उन्होंने जो देखा और महसूस किया, उसे उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा किया। उनका यह विचार मुखियाजी डॉट कॉम अक्षरशः प्रकाशित कर रहा है। इसमें उनके निजी विचार हैं।

कल शाम जंतर-मंतर गया। हजारों युवाओं की आंखों में बेचैनी देखी, उम्मीद भी। उनके अनुशासन, संयम और संकल्प ने प्रभावित किया। भीषण गर्मी में कोई केवल बहकावे में आकर हफ्तों सड़क पर नहीं बैठ सकता। यह उनके भविष्य की लड़ाई है और इसीलिए उनकी पीड़ा सच्ची है। मैं युवा आक्रोश के खिलाफ नहीं हूं, न ही उनके आंदोलन का विरोधी। मेरा स्पष्ट मानना है कि पेपर लीक के इस घिनौने खेल में जो भी दोषी हैं, उन्हें ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो भविष्य के लिए मिसाल बन जाए। चाहे वे हैकर हों या व्यवस्था के भीतर छिपे वे अधिकारी, जिन्होंने अपनी जिम्मेदारी से विश्वासघात किया। मेरा यह भी मानना है कि इस पूरे प्रकरण की नैतिक जिम्मेदारी संबंधित मंत्री की है और उन्हें पद छोड़ देना चाहिए। लेकिन इसके साथ एक चिंता भी है, जो पेपर लीक से भी बड़ी है। हमारे देश में युवाओं के आक्रोश को बहुत जल्दी सियासत अपने कब्जे में ले लेती है। आंदोलन युवाओं का होता है, लेकिन उसकी बागडोर सियासी दलों के हाथों में चली जाती है। जो बच्चे अपने भविष्य की लड़ाई लड़ने निकलते हैं, वे देखते-देखते किसी और की महत्वाकांक्षा के मोहरे बन जाते हैं।

अन्ना आंदोलन के दिनों में मैं भी पूरे मन से उनके साथ खड़ा था। हिंदुस्तान अखबार (मेरठ) में जिम्मेवार पद पर रहते हुए भी मेरा नैतिक समर्थन था। लगता था कि देश की राजनीति का चरित्र बदल जाएगा, लेकिन बाद में जिस तरह अन्ना हजारे की निर्दोष भावना और करोड़ों लोगों के भरोसे को कुछ लोगों ने अपनी सियासत की सीढ़ी बना लिया, वह सबके सामने है। पीछे मुड़कर देखता हूं तो उस दौर की अपनी सहज आस्था पर आज अफसोस होता है। सक्रिय पत्रकारिता ने मुझे आंदोलनों का केवल दर्शक नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें भीतर तक समझने का अवसर भी दिया। बिहार की पत्रकारिता में लंबे समय तक शीर्ष जिम्मेदारियों पर रहते हुए मैंने आपातकाल के खिलाफ उठे जनाक्रोश को पढ़ा, लिखा और बहुत करीब से महसूस किया। इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हुईं, लेकिन उन्हें हटाने के लिए साथ आए लोग सत्ता मिलने के बाद आपस में ही भिड़ गए। नतीजा यह हुआ कि जनता पार्टी की सरकार ढाई साल भी नहीं टिक सकी। जनता की उम्मीदें सत्ता की महत्वाकांक्षाओं के नीचे दब गयीं।

वीपी सिंह का दौर भी ऐसी ही टीस छोड़ जाता है। तब मैं इंटर का छात्र था और भाकपा के छात्र संगठन से जुड़ा हुआ था। औरंगाबाद (गोह) से भाकपा के सात बार विधायक रहे रामशरण यादव से मैं बेहद प्रभावित था और लोकसभा चुनाव में पार्टी के लिए काम भी किया था। वीपी सिंह के प्रधानमंत्री बनने पर लगा था कि देश के विकास का एक नया अध्याय शुरू होगा। लेकिन वह सपना भी जल्दी बिखर गया। प्रधानमंत्री की कुर्सी को लेकर शुरू हुई खींचतान ने आदर्शों को पीछे धकेल दिया और स्वार्थ सामने आ गया। इसीलिए आज जब किसी जनांदोलन को देखता हूं तो समर्थन के साथ-साथ आशंका भी भीतर सिर उठाती है। इतिहास बार-बार सिखाता है कि आंदोलन तब कमजोर नहीं पड़ते जब उनकी ऊर्जा खत्म होती है, बल्कि तब कमजोर पड़ते हैं जब उनका नेतृत्व उनकी मूल भावना से भटक जाता है। जैसे ही ईमानदार नेतृत्व की जगह राजनीतिक चतुराई ले लेती है, आंदोलन का रास्ता बदलने लगता है। सबसे पहले उसका नैतिक बल कमजोर होता है और अंत में वही बच्चे ठगे जाते हैं, जिनके सपनों और आक्रोश ने उसे जन्म दिया था।

जंतर-मंतर की भीड़ के जज्बे ने मुझे प्रभावित किया, लेकिन उसी भीड़ के बीच एक डर भी है। पहले दिन यह आंदोलन पूरी तरह बच्चों का था। दूसरे दिन से राजनीतिक दलों के चेहरे हावी होने लगे। कांग्रेस अपने तरीके से आयी और आम आदमी पार्टी अपने तरीके से। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि राजनीति खाली जगह कभी नहीं छोड़ती। किंतु किसी भी आंदोलन की कठिन परीक्षा यहीं से शुरू होती है। बहरहाल, मुझे डर इस बात का नहीं कि नेता मंच पर आ रहे हैं। डर इस बात का है कि कहीं ऐसा न हो कि कुछ दिनों बाद मंच तो नेताओं के पास रह जाए और जिन बच्चों ने इस आंदोलन को जन्म दिया, वे भीड़ में गुम हो जाएं। भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसा एक बार नहीं, कई बार हुआ है। आंदोलनों ने व्यवस्था बदली, लेकिन आंदोलनकारियों के हिस्से अक्सर केवल ताली और तसल्ली आयी, जबकि सत्ता लाभ किसी और की झोली में चला गया। बिहार में 1994 में कुर्मी चेतना रैली इसका उदाहरण है। आंदोलन के मुख्य सूत्रधार सतीश कुमार थे, मगर सत्ता का लाभ नीतीश कुमार के खाते में आ गया। मेरी कामना इतनी है कि इस बार ऐसा न हो। यह आंदोलन अगर सचमुच युवाओं के भविष्य का आंदोलन है तो इसकी दिशा और निर्णय भी उन्हीं के हाथ में रहने चाहिए। नेताओं का समर्थन स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन नेतृत्व नहीं। क्योंकि जिस दिन आंदोलन का रिमोट युवाओं के हाथ से निकलकर राजनीति के हाथ में चला जाता है, उसी दिन उसकी आत्मा सबसे पहले घायल होती है।