Rajesh Thakur | Patna
15 जून। बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कार्यकाल का दूसरा माह पूरा। इस तिथि को भवन निर्माण विभाग से छोटा-सा आदेश जारी हुआ। लेकिन इस छोटे-से आदेश में उम्मीद से भी बड़े संदेश छिपे थे। यह संदेश सियासत के भी थे और दिल के भी। समाज के लिए भी थे और जमात के लिए भी। संदेश यही था कि उपमुख्यमंत्री वाला बंगला (5 देशरत्न मार्ग) में अब स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार रहेंगे। यह बंगला अपनी ‘शाही सुविधा’ के सियासी महकमे में काफी लोकप्रिय है। पिछले माह मुख्यमंत्री आवास को विस्तार कर इस बंगले को शामिल किया गया था। इसे लेकर काफी बयानबाजी हुई थी। एक समय था, जब इसी बंगले को लेकर सुशील मोदी और तेजस्वी यादव के बीच ठन गयी थी। मामला पटना हाईकोर्ट पहुंच गया था। आज वह बंगला मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने काफी आसानी से स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार के हवाले कर दी और जो बंगला निशांत को पहले से मिला था, उसे मंत्री रामकृपाल यादव को अलॉट कर दिया गया है।


नहीं बदलते हैं कुछ रिश्ते : दरअसल, बिहार की राजनीति में सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर पीढ़ियों तक अपना असर छोड़ जाते हैं। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार को 5 देशरत्न मार्ग का आवास आवंटित किए जाने की खबर को केवल सरकारी आवास के आवंटन के रूप में देखना शायद इस फैसले के भावनात्मक पक्ष को नजरअंदाज करना होगा। यह वही सम्राट चौधरी हैं, जिनकी राजनीतिक यात्रा के कई कठिन मोड़ों पर नीतीश कुमार ने केवल एक नेता की नहीं, बल्कि एक अभिभावक की भूमिका निभायी। कभी-कभी वैचारिक मतभेद के बाद भी दोनों के बीच अभिभावक वाला स्नेह बरकरार रहा। बिहार की राजनीति में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो यह न मानता हो कि सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में नीतीश कुमार का मार्गदर्शन, विश्वास और संरक्षण निर्णायक रहा है। राजनीति के उतार-चढ़ाव के बीच भी दोनों के रिश्तों में एक पारिवारिक आत्मीयता हमेशा दिखाई देती रही है। आज जब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और सम्राट चौधरी राज्य के मुख्यमंत्री हैं, तब उनके इस फैसले को उसी भावनात्मक निरंतरता के रूप में देखा जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह निशांत कुमार को केवल एक मंत्री या सहयोगी के रूप में नहीं, बल्कि उस परिवार के सदस्य के रूप में देख रहे हैं, जिसके मुखिया ने कभी उनके लिए अभिभावक की भूमिका निभायी थी।
5 नंबर बंगला इतना लोकप्रिय क्यों : लेकिन बड़ा सवाल है कि 5 नंबर बंगला इतना लोकप्रिय क्यों है? जानकारों की मानें तो सियासी गलियारे का 5 देशरत्न मार्ग केवल एक सरकारी बंगला नहीं, बल्कि बिहार की राजनीतिक विरासत और सत्ता के केंद्र का प्रतीक माना जाता है। लंबे समय तक यह आवास राज्य के शीर्ष नेतृत्व और महत्वपूर्ण राजनीतिक हस्तियों से जुड़ा रहा है। राजधानी के सबसे सुरक्षित और प्रतिष्ठित सरकारी परिसरों में शामिल यह बंगला अपनी विशाल संरचना, बेहतर सुविधाओं और प्रशासनिक महत्व के कारण विशेष पहचान रखता है। बिहार की राजनीति में इस बंगले का अपना अलग इतिहास और महत्व रहा है, जिसके कारण इसे राज्य की सत्ता और प्रभाव के सबसे महत्वपूर्ण पतों में गिना जाता है। यही वजह रही कि जब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक अणे मार्ग का विस्तार कर 5 देशरत्न मार्ग को मुख्यमंत्री आवास परिसर में शामिल करने का निर्णय लिया था, तब बिहार की राजनीति में इसे लेकर काफी चर्चा हुई थी। विपक्ष ने इस फैसले पर सवाल उठाए थे और इसे सत्ता के केंद्रीकरण से जोड़कर देखा था। राजनीतिक गलियारों में यह बहस भी चली कि इस बंगले की स्वतंत्र पहचान अब खत्म हो जाएगी। कई दिनों तक सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी का दौर चलता रहा। लेकिन एक झटके में सारी बयानबाजी पर विराम लग गया।
सम्राट चौधरी ने तोड़ी धारणा : बिहार की राजनीति में 5 देशरत्न मार्ग को लेकर वर्षों से एक दिलचस्प चर्चा चलती रही है। चूंकि यह बंगला परंपरागत रूप से उपमुख्यमंत्री के लिए आवंटित होता रहा है, इसलिए सियासी गलियारों में यह धारणा बन गयी थी कि यहां रहने वाले नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाते हैं। पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी लंबे समय तक इस बंगले में रहे, लेकिन मुख्यमंत्री नहीं बन सके। इसके बाद तेजस्वी यादव को भी यह आवास मिला, मगर वे भी मुख्यमंत्री पद तक नहीं पहुंच पाए। वर्ष 2020 के बाद उपमुख्यमंत्री बने तारकिशोर प्रसाद भी इसी बंगले में रहे, लेकिन उनका राजनीतिक सफर भी मुख्यमंत्री पद तक नहीं पहुंच सका। यही वजह थी कि जब उपमुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी को 5 देशरत्न मार्ग आवंटित हुआ, तब राजनीतिक हलकों में पुरानी चर्चाएं फिर से शुरू हो गयीं। कुछ लोग इसे महज संयोग मान रहे थे, तो कुछ इसे बंगले से जुड़ी ‘राजनीतिक किस्मत’ की कहानी से जोड़कर देख रहे थे। लेकिन समय ने यह धारणा बदल दी। सम्राट चौधरी न केवल इस बंगले में रहे, बल्कि पहले गृहमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे, फिर विधायक बनकर बिहार के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे। उनके मुख्यमंत्री बनने के साथ ही 5 देशरत्न मार्ग से जुड़ी वर्षों पुरानी अफवाहों और राजनीतिक भ्रांतियों पर लगभग विराम लग गया। अब यह बंगला एक नयी राजनीतिक मिसाल के रूप में भी देखा जा रहा है कि लोकतंत्र में मंजिल का फैसला किसी पते से नहीं, बल्कि राजनीतिक परिस्थितियों, नेतृत्व क्षमता और जनसमर्थन से होता है।
सुशील मोदी वर्सेज तेजस्वी यादव : 5 देशरत्न मार्ग का बंगला केवल सरकारी आवास नहीं, बल्कि कई बार बिहार की बड़ी राजनीतिक लड़ाइयों का भी केंद्र रहा है। एक दौर ऐसा भी आया जब इस बंगले को लेकर तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के बीच सीधी टकराहट की स्थिति बन गयी थी। दरअसल, एनडीए सरकार के दौरान उपमुख्यमंत्री रहते हुए सुशील मोदी इसी बंगले में रहते थे। 2015 में महागठबंधन सरकार बनने पर उपमुख्यमंत्री बने तेजस्वी यादव को यह आवास आवंटित कर दिया गया। बताया जाता है कि अपने कार्यकाल के दौरान तेजस्वी यादव ने बंगले की साज-सज्जा और आंतरिक संरचना में व्यापक बदलाव कराए। राजनीतिक विरोधी उस समय इसे व्यंग्य में ‘शीशमहल’ तक कहने लगे थे। हालांकि, तेजस्वी यादव इस बंगले में ठीक से 2 साल भी नहीं रहे थे कि 2017 में नीतीश कुमार ने पाला बदलते हुए एनडीए में आ गए। इसके बाद नियमों के अनुसार 5 देशरत्न मार्ग का आवंटन फिर से उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के नाम कर दिया गया। लेकिन विवाद तब गहरा गया, जब तेजस्वी यादव ने बंगला खाली करने से इनकार कर दिया। मामला राजनीतिक बयानबाजी से निकलकर कानूनी लड़ाई तक पहुंच गया। आखिरकार यह विवाद पटना हाईकोर्ट तक पहुंचा, जहां सुनवाई के बाद फैसला सुशील कुमार मोदी के पक्ष में आया। न्यायालय के आदेश के बाद बंगला खाली हुआ और सुशील मोदी को उसका कब्जा मिला।
बंगला से हटा उपमुख्यमंत्री का ठप्पा : लगभग ढाई दशक के बाद इस बंगले से उपमुख्यमंत्री का ठप्पा हट गया। अब यह नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार के नाम से आवंटित हो गया है। इसके लिए समर्थक मुख्यमंत्री की प्रशंसा भी कर रहे हैं। राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि सत्ता रिश्तों को कमजोर कर देती है, लेकिन यह निर्णय एक अलग संदेश देता है। यह संदेश है कि कृतज्ञता और सम्मान केवल भाषणों में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी दिखाई देने चाहिए। जिस तरह कभी नीतीश कुमार ने सम्राट चौधरी को आगे बढ़ने का अवसर दिया, उसी तरह सम्राट चौधरी आज निशांत कुमार के प्रति एक बड़े भाई और संरक्षक जैसा भाव प्रदर्शित करते नजर आते हैं। 5 देशरत्न मार्ग का बंगला इसलिए केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं रह जाता। यह राजनीतिक संस्कारों और मानवीय संबंधों का प्रतीक बन जाता है। सत्ता के गलियारों में अक्सर कठोर गणित चलता है, लेकिन कभी-कभी कुछ फैसले ऐसे भी होते हैं जिनमें भावनाओं की गर्माहट दिखाई देती है। बिहार पॉलिटिक्स के जानकार इस फैसले को अलग-अलग नजरिए से देख सकते हैं। कोई इसे राजनीतिक संदेश बता रहा है तो कोई प्रशासनिक निर्णय। लेकिन कुछ लोग इसे एक भावनात्मक संदेश के रूप में पढ़ रहे हैं।
क्या 10 नंबर का भी विवाद सुलझेगा : बहरहाल, राजनीति में कुछ फैसले केवल प्रशासनिक नहीं होते, वे अपने साथ एक संदेश भी लेकर आते हैं। 5 देशरत्न मार्ग का निशांत कुमार को आवंटन भी कुछ ऐसा ही निर्णय माना जा रहा है। कभी सुशील मोदी-तेजस्वी यादव विवाद का केंद्र रहा यह बंगला, कभी राजनीतिक अंधविश्वासों और चर्चाओं का विषय बना, तो कभी मुख्यमंत्री आवास में विलय को लेकर सुर्खियों में रहा। अब यही एड्रेस एक नए राजनीतिक और भावनात्मक अध्याय का साक्षी बन रहा है। सियासी गलियारों में इस फैसले को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की ओर से नीतीश कुमार के प्रति सम्मान और उनके परिवार के प्रति आत्मीयता के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। शायद यही कारण है कि इस बार चर्चा बंगले की नहीं, बल्कि उस रिश्ते की हो रही है, जिसमें राजनीति से अधिक अपनापन और विश्वास दिखाई दे रहा है। और खास बात कि यह निर्णय ऐसे समय में आया है, जब एक अन्य मामले में 10 नंबर को लेकर बंगला विवाद चल रहा है।




