Fanishwar Nath Renu Anniversary : ‘पंचलाइट’ में ‘सात खून माफ’ की क्या है मानसिकता, जाति अब धर्म…!

4 मार्च 1921। आंचलिक कथाकार के रूप में लोकप्रिय फणीश्वरनाथ रेणु आज जिंदा होते तो 95 साल के होते तो, लेकिन वे महज 56 साल की उम्र में 11 अप्रैल 1977 को चल बसे। लेकिन वे अपनी रचनाओं से आज भी जिंदा हैं तथा सदियों तक जिंदा रहेंगे भी। उनकी तो सभी कथाएं और कहानियां आज भी खूब पढ़ी जाती हैं। खासकर ‘तीसरी कसम’ और ‘पंचलैट’ इतनी अधिक लोकप्रिय हुई कि इन पर फिल्म भी बनी। लेकिन इसमें पंचलैट यानी पंचलाइट की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। कहानी पंचलाइट केवल एक आंचलिक प्रसंग नहीं, बल्कि भारतीय समाज की गहरी संरचना का विश्लेषण है। यह कहानी बताती है कि आधुनिकता की चमक के बावजूद सत्ता, नैतिकता और प्रतिष्ठा की असली धुरी आज भी जाति ही है। ‘पंचलाइट’ में रोशनी से अधिक उजागर होता है वह मानसिक ढांचा, जिसमें मनुष्य नहीं, जातीय उपयोगिता न्याय और सम्मान तय करती है। इस कहानी के बहाने लेखक व शिक्षाविद चंद्रबिंद ने इसका विस्तृत विश्लेषण किया है। लेखक पेशे से वरीय शिक्षक हैं और हिंदी साहित्य पर जबरदस्त पकड़ है। यहां प्रकाशित लेख में उनके निजी विचार हैं…

हिंदी कथा-साहित्य में फणीश्वरनाथ रेणु का स्थान केवल एक आंचलिक कथाकार का नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक दूरदर्शी लेखक का है। उनकी कहानी पंचलाइट को आज के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों में पढ़ना, दरअसल भारतीय समाज की मूल संरचना को पढ़ना है। यह कहानी किसी एक गांव, एक टोले या एक जाति की कथा नहीं है, बल्कि उस मानसिक ढांचे का उद्घाटन है जिसके भीतर सदियों से भारतीय समाज संचालित होता आया है। रेणु ने बहुत पहले देख लिया था कि आधुनिकता, लोकतंत्र, शिक्षा, विज्ञान और विकास की चमक चाहे जितनी बढ़ जाए, भारतीय समाज की असली धुरी जाति ही बनी रहेगी। जाति केवल पहचान नहीं है, वह सत्ता है, अनुशासन है, नियंत्रण का उपकरण है और सबसे बढ़कर नैतिकता का पैमाना है।
महतो टोली के संदर्भ में ‘अपना’ शब्द का प्रयोग केवल अपनत्व नहीं, बल्कि जातीय स्वामित्व और सामूहिक सत्ता का प्रतीक है। जब रेणु लिखते हैं- ‘टोले भर के लोग जमा हो गए। औरत-मर्द, बूढ़े-बच्चे सभी काम का छोड़कर दौड़ आए- चल रे चल ! अपना पंचलैट आया है, पंचलैट! छड़ीदार अगनू महतो रह-रहकर लोगों को चेतावनी देने लगा।’ तो यहां ‘अपना’ का अर्थ केवल वस्तु का स्वामित्व नहीं, बल्कि जातीय गौरव का उद्घोष है। पंचलाइट कोई साधारण लालटेन नहीं रह जाती, वह जातीय प्रतिष्ठा का प्रतीक बन जाती है। यह वही मानसिकता है जिसमें संसाधन, उपलब्धियां और वस्तुएं तक जातीय अर्थ ग्रहण कर लेती हैं। आज भी यही स्थिति दिखाई देती है। किसी अधिकारी की नियुक्ति हो, किसी खिलाड़ी की सफलता हो, किसी लेखक की उपलब्धि हो या किसी नेता की जीत। सबसे पहले उसकी जाति पूछी जाती है। यानी आधुनिकता की सतह के नीचे जाति का अवचेतन लगातार सक्रिय रहता है।

लेखक व शिक्षाविद चंद्रबिंद।

रेणु जातीय चेतना और जातिवाद के बीच का सूक्ष्म अंतर भलीभांति समझते थे। जातीय चेतना एक सामाजिक यथार्थ है, वह पहचान का स्रोत हो सकती है, लेकिन जातिवाद उस पहचान का विकृत और हिंसक रूप है, जिसमें विवेक का अंत हो जाता है। कहानी में गोधन का प्रसंग इसी अंतर को उजागर करता है। ‘गुलरी काकी की बेटी मुनरी के मुंह में बार बार एक बात आकर मन में लौट जाती है। वह कैसे बोले ? वह जानती है कि गोधन पंचलैट बालना जानता है। लेकिन, गोधन का हुक्का पानी पंचायत से बंद है। मुनरी की मां ने पंचायत से फरियाद की थी कि गोधन रोज उसकी बेटी को देखकर ‘सलम सलम’ वाला सलीमा का गीत गाता है – ‘हम तुमसे मोहब्बत करके सलम। पंचों की निगाह पर गोधन बहुत दिन से चढ़ा हुआ था। दूसरे गांव से आकर बसा है गोधन, और अब तक टोले के पंचों को पान-सुपारी खाने के लिए भी कुछ नहीं दिया | परवाह ही नहीं करता। बस, पंचों को मौका मिला। 10/- रुपया जुर्माना। न देने से हुक्का पानी बंद। आज तक गोधन पंचायत से बाहर है। उससे कैसे कहा जाए। मुनरी उसका नाम कैसे ले और उधर जाति का पानी उतर रहा है।’ यहां गोधन का अपराध नैतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक है। उसने सत्ता संरचना को चुनौती दी है। उसने पान-सुपारी नहीं दी, यानी उसने जातीय प्रभुत्व को स्वीकार नहीं किया। यही जातिवाद का असली चेहरा है। यह नैतिकता का प्रश्न नहीं, बल्कि सत्ता के संरक्षण का तंत्र है। सामाजिक दंड व्यवस्था भी इसी तंत्र का हिस्सा है। हुक्का-पानी बंद करना न्याय नहीं, बल्कि सामाजिक नियंत्रण का तरीका है। यह व्यवस्था सार्वभौमिक नहीं होती। यह केवल अपने समुदाय के कमजोर व्यक्ति पर लागू होती है। दूसरी जातियों या शक्तिशाली लोगों पर यह लागू नहीं होती। यही कारण है कि जातिवादी समाज में न्याय कभी समान नहीं होता।

आज भी यही व्यवस्था नए रूपों में मौजूद है। सामाजिक बहिष्कार, पंचायतों के फैसले, ऑनर किलिंग, आर्थिक बहिष्कार, डिजिटल और ट्रोलिंग, ये सब उसी मानसिकता के आधुनिक संस्करण हैं। जातिवाद का चेहरा बदल गया है, लेकिन उसका चरित्र वही है- नियंत्रण और दमन। इस कहानी के माध्यम से, रेणु यह साफ-साफ बताते हैं कि जाति के सामने नैतिकता का कोई मूल्य नहीं रह जाता। कहानी में निर्णायक क्षण तब आता है, जब जाति की प्रतिष्ठा संकट में पड़ती है; क्योंकि बाकी की देखा-देखी महतो टोली में भी पंचलाइट तो आ गयी, पर अब उसे जलाएगा कौन? और जो जलाना जानता है, वह अकेला गोधन ही है, जिसका हुक्का-पानी बंद कर दिया गया है। लेकिन, जब बात जातीय मर्यादा की होती है तो देखिए, तर्क कैसे कुतर्क में बदल जाता है। ‘सरदार ने दीवान की ओर देखा और दीवान ने पंचों की ओर। पंचों ने एक मत होकर हुक्का-पानी बंद किया है | सलीमा का गीत गाकर आंख का इशारा मारने वाले गोधन से गांव भर के लोग नाराज थे। सरदार ने कहा- ‘जाति की बंदिश क्या, जबकि जाति की इज्जत ही पानी में बही जा रही है! क्यों जी दीवान ?’
दीवान ने कहा- ‘ठीक है।’ पंचों ने भी एक स्वर में कहा- ‘ठीक है। गोधन को खोल दिया जाए।’ यहां गोधन निर्दोष नहीं हुआ। वह केवल उपयोगी हो गया। उसकी योग्यता ने उसे मुक्त किया, उसकी नैतिकता ने नहीं। यही भारतीय समाज की कठोर सच्चाई है। न्याय नहीं, उपयोगिता स्वीकृति तय करती है। जब तक वह जातीय सत्ता के लिए खतरा था, वह अपराधी था। जैसे ही वह जातीय प्रतिष्ठा बचाने का साधन बना, वह सम्मानित हो गया।

यही मानसिकता आज की राजनीति में साफ दिखाई देती है। अपराधी नेता जातीय नायक बन जाते हैं, भ्रष्टाचार जातीय संरक्षण में वैध हो जाता है, नैतिकता चुनावी गणित के सामने गौण हो जाती है। लोकतंत्र की भाषा समानता की है, लेकिन व्यवहार में जाति ही अंतिम निर्णायक बनी रहती है। कहानी का सबसे भयावह वाक्य तब आता है जब गोधन पंचलाइट जला देता है और सरदार प्रसन्न होकर कहता है- ‘तुमने जाति की इज्जत रखी है। तुम्हारे सात खून माफ। खूब गाओ सलीमा का गाना।’ यह वाक्य केवल भावुकता नहीं, बल्कि सामूहिक हिंसा की वैधता का उद्घोष है। ‘सात खून माफ’ का अर्थ है कि जाति के हित में अपराध भी न्याय बन जाता है। यह वही मानसिकता है, जो आज भी भीड़ हत्याओं, जातीय हिंसा, सांप्रदायिक दंगों और राजनीतिक संरक्षण में दिखाई देती है। यह कानून से ऊपर जाति की सत्ता का ऐलान है। मुनरी और गोधन की आंखों का मिलना कहानी का सबसे मानवीय क्षण है, लेकिन वही सबसे खतरनाक भी है। प्रेम जाति की सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि वह जातीय सीमाओं को तोड़ देता है। भारतीय समाज में प्रेम हमेशा विद्रोह माना गया है। आज भी अंतरजातीय विवाहों के संदर्भ में हिंसा इसी मानसिकता का प्रमाण है। यदि आज की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति पर नजर डालें, तो स्पष्ट होता है कि रेणु की दृष्टि कितनी दूरदर्शी थी। आज जाति राजनीति की केंद्रीय शक्ति है, मीडिया की अदृश्य धुरी है और समाज की नैतिकता का आधार है। नेता, पत्रकार और बुद्धिजीवी सभी अपनी-अपनी जातियों के प्रतिनिधि की तरह व्यवहार करते दिखाई देते हैं। लोकतंत्र के भीतर जातीय सरदारों का एक समानांतर तंत्र सक्रिय है।

रेणु की सबसे बड़ी वैश्विक अंतर्दृष्टि यह है कि यदि जाति की जगह धर्म रख दिया जाए, तो कहानी का स्वरूप वही रहेगा। यानी यह केवल भारतीय समस्या नहीं, बल्कि सामूहिक पहचान की राजनीति का सार्वभौमिक मॉडल है। जहां भी सामूहिक पहचान नैतिकता पर हावी होती है, वहां विवेक का अंत और हिंसा की वैधता अनिवार्य हो जाती है। ‘पंचलाइट’ दरअसल भारतीय समाज की नैतिक संरचना का एक्स-रे है। यह दिखाती है कि आधुनिकता की रोशनी चाहे जितनी फैल जाए, समाज की असली लौ जाति ही बनी रहती है। वही रोशनी देती है, वही जलाती भी है। आज डिजिटल युग, वैश्विक नागरिकता और वैज्ञानिक प्रगति के दौर में भी समाज की गहराई में वही पंचलाइट जल रही है जो प्रकाश कम, पहचान की आग अधिक देती है। रेणु की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जब तक समाज की नैतिकता का आधार मनुष्य नहीं बल्कि जाति रहेगा, तब तक हर रोशनी अंततः आग में बदलती रहेगी।