Bihar : देखिए नगर विकास मंत्री जी! नगर परिषद की करतूत, खुले नाले ने ली बच्ची की जान

Patna | Ajeet Kumar
बिहार विधानसभा का बजट सत्र चल रहा है। सदन में विकास, आधारभूत संरचना और शहरी सुधार की लंबी-लंबी बातें हो रही हैं। लेकिन पटना से सटे फुलवारीशरीफ के ईसापुर में जिस तरह दो साल की मासूम खदीजा की खुले नाले में गिरने से मौत हुई है, वह पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है। हादसे में बच्ची की नहीं, बल्कि सरकार के सिस्टम की ‘मौत’ हुई है। बच्ची की इस मौत ने उसके माता-पिता को बेजान कर दिया है। पिता की सूनी आंखें मानो पूछ रही हैं- देखिए नगर विकास मंत्री जी! नगर परिषद की करतूत, खुले नाले ने ली मेरी बच्ची की जान…। मौत ने सरकार और विभाग के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

पटना के फुलवारीशरीफ के ईसापुर में दो साल की खदीजा की मौत किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं है । यह मौत है विभाग की लापरवाही की। यह मौत है उस सिस्टम की, जो फाइलों में विकास की इबारत लिखता है, लेकिन जमीन पर नाले तक ढंक नहीं पाता और इसी खुले नाले में गिरकर दो वर्ष की एक मासूम बच्ची की जान चली गयी। ऐसे में सवाल तो उठेंगे ही, कि इस मौत के जिम्मेदार कौन? क्या सिर्फ एक कार्यपालक पदाधिकारी? या पूरा प्रशासनिक तंत्र, जिसकी कमान नगर विकास विभाग के हाथ में है? अथवा कोई और…? दरअसल, आज ईसापुर में उस समय लोग सकते में आ गये, जब पता चला कि असम के मूल निवासी सद्दाम हुसैन की दो वर्षीया बेटी खदीजा घर से गायब है। पहले तो लोगों को अपहरण की आशंका हुई। पुलिस ने सीसीटीवी को खंगाला तो ‘सबकुछ’ सामने आ गया। बच्ची खेलते-खेलते नाले में गिर गयी थी। नाले में पानी का बहाव तेज होने से वह आगे बह गयी। स्थानीय लोगों ने नाले के अंदर खोजबीन की तो बच्ची का शव बरामद हुआ।

बिहार में नगर विकास एवं आवास विभाग की जिम्मेदारी वर्तमान में उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा के पास है। विभाग योजनाओं की घोषणा करता है, फंड आवंटित करता है, मॉनिटरिंग की बात करता है, लेकिन ईसापुर जैसे इलाकों में खुले नाले आज भी गाहे-बगाहे मौत का कारण बना हुआ है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई बार खुले नालों और मेन हॉल की शिकायत की गयी है, लेकिन विभाग को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। गाड़ियां फंसती हैं तो अपनी बला से। लोग गिरते रहे, तो भी किन्हीं को कोई मतलब नहीं है। हां, अब जब बच्ची की नाले में गिरने से जान चली गयी है, तो विभाग की नींद अचानक खुल गयी । नगर परिषद ने आनन-फानन में जांच के आदेश दिए हैं। ऐसे में सवाल तो उठेगा कि क्या हर मौत के बाद ही किसी हादसे या अन्य की जांच होगी? नगर विकास व आवास विभाग हर साल शहरों के ‘स्मार्ट’ बनने का दावा करता है। लेकिन क्या स्मार्ट सिटी का पहला पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि नाले खुले न हों? क्या बजट में नालों को ढंकने, जल निकासी को सुरक्षित बनाने, जोखिम वाले स्थानों की पहचान करने का प्रावधान नहीं है? अगर है, तो जमीनी हकीकत इतनी भयावह क्यों है?

बहरहाल, यह सिर्फ फुलवारीशरीफ की बात नहीं है। पटना समेत राज्य के कई नगर परिषद क्षेत्रों में खुले नालों या मेन हॉल की शिकायत मिलती रहती है। बरसात में तो यह और अधिक जानलेवा हो जाता है। हर साल किसी न किसी हादसे की खबर आती है, लेकिन कार्रवाई का सिलसिला फाइलों में ही दम तोड़ देता है। खदीजा की मौत ने एक गरीब मजदूर पिता की गोद सूनी कर दी। वह असम से रोजी-रोटी की तलाश में बिहार आया था, लेकिन जिस शहर में उसने आसरा लिया, वहीं की लापरवाही उसकी दुनिया उजाड़ दी। नगर विकास मंत्री जी, यह सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं है, यह जवाबदेही का सवाल है। अगर जवाबदेही तय नहीं हुई, तो हर खुला नाला किसी और घर की खुशियां निगलने को तैयार खड़ा है…!!

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