Ajeet । Fulwari Sharif
सामाजिक सरोकारों की मजबूत पहचान बना चुकी इमारत-ए-शरिया ने एक बार फिर जमीनी हकीकतों की ओर रुख किया है। राहत राशि के वितरण से लेकर जन-जागरूकता अभियानों तक संस्था ने जरूरतमंदों के बीच उम्मीद और भरोसे का पैगाम पहुंचाने की मुहिम तेज की है। इस पहल का मकसद सिर्फ मदद नहीं, बल्कि समाज को संकट के दौर में संगठित और सजग बनाना भी है। इसी को लेकर इमारत ए शरिया ने बिहार, ओडिशा और झारखंड में बढ़ती भीड़ हिंसा की घटनाओं पर चिंता जताते हुए प्रभावित परिवारों के बीच राहत निधि का वितरण किया है। इमारत-ए-शरिया के नाजिम मौलाना मुफ्ती मुहम्मद सईद-उर-रहमान कासमी ने कहा कि भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या की घटनाएं लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक संतुलन के लिए गंभीर खतरा हैं। उन्होंने बताया कि जहानाबाद, बिहारशरीफ, मधुबनी, मधेपुरा और झारखंड के विभिन्न इलाकों में हुई घटनाओं के बाद इमारत-ए-शरिया की टीमों ने मौके पर पहुंचकर पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता प्रदान की। सरकारी सहायता नहीं मिलने से निराश परिवारों ने इमारत-ए-शरिया की इस पहल पर संतोष जताया। मुफ्ती कासमी ने कहा कि मानव जीवन सबसे अनमोल है और धर्म के नाम पर हिंसा करना स्वयं धर्म का अपमान है। उन्होंने सरकार से दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और पीड़ितों को न्याय दिलाने की मांग की।



उधर तिलक, दहेज और बारात से परहेज को लेकर इमारत-ए-शरिया ने लोगों को जागरूक किया जा रहा है। यह अभियान हजरत अमीर शरिया मौलाना सैयद अहमद वली फैसल रहमानी के निर्देश पर चलाया जा रहा है। बिहार के विभिन्न जिलों में चलाये जा रहे सामाजिक सुधार और जन-जागरूकता अभियान का मुख्य उद्देश्य मुस्लिम समाज में प्रचलित तिलक, दहेज और बारात जैसी गैर-इस्लामी परंपराओं को समाप्त करना और निकाह को सरल, सादा एवं शरीअत के अनुरूप बनाना है। इस अभियान के तहत इमारत-ए-शरिया के अधिकारी, उलेमा और प्रतिनिधिमंडल अलग-अलग क्षेत्रों का दौरा कर मस्जिदों, मदरसों, सामाजिक बैठकों और आम जनसभाओं में लोगों को जागरूक कर रहे हैं। लोगों को बताया जा रहा है कि तिलक, दहेज और दिखावे वाली बारात न केवल इस्लामी शिक्षाओं के खिलाफ है, बल्कि समाज में आर्थिक बोझ, वैवाहिक विलंब और कई सामाजिक समस्याओं को भी जन्म देती है।

इमारत-ए-शरिया के सहायक नाजिम मौलाना अहमद हुसैन कासमी मदनी ने कहा कि इस्लाम सादगी, समानता और इंसाफ की शिक्षा देता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि तिलक, दहेज और बारात पूरी तरह गैर-इस्लामी रीति-रिवाज हैं और मुसलमानों को इनसे परहेज करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुरान और सुन्नत के अनुसार सादा निकाह ही समाज को मजबूत बना सकता है और इसी में दीन व दुनिया की भलाई है। अभियान के दौरान केवल वैवाहिक सुधार तक ही बात सीमित नहीं रखी जा रही है, बल्कि धार्मिक शिक्षा को मजबूत करने, बेटियों को इस्लाम द्वारा प्रदत्त विरासत के अधिकार, सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन और इमारत ए शरिया से मजबूत संगठनात्मक जुड़ाव पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है।
वक्ताओं द्वारा यह संदेश दिया जा रहा है कि जब तक समाज शरीअत की शिक्षाओं को अपनाएगा नहीं, तब तक स्थायी सुधार संभव नहीं है। इमारत-ए-शरिया के नाजिम मौलाना मुफ्ती मुहम्मद सईद-उर-रहमान कासमी इस पूरे अभियान की लगातार निगरानी कर रहे हैं। वे प्रतिनिधिमंडलों से संपर्क में रहकर जिलावार रिपोर्ट ले रहे हैं और अभियान को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश भी जारी कर रहे हैं। स्थानीय लोगों ने इस अभियान की सराहना करते हुए कहा कि इमारत-ए-शरिया की यह पहल समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। लोगों ने उम्मीद जतायी कि इस तरह के जागरूकता अभियानों से आने वाले समय में मुस्लिम समाज में सादगीपूर्ण निकाह और सामाजिक सुधार की परंपरा मजबूत होगी।







