Rajesh Thakur । Patna
बिहार विधानसभा के स्थापना दिवस पर 7 फरवरी को उसके सेंट्रल हॉल में ‘सशक्त विधायक – सशक्त लोकतंत्र’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने संविधान की मूल प्रति में अंकित ऐतिहासिक चित्रों का विस्तार से उल्लेख किया। अध्याय दर अध्याय संदर्भ गिनाए। उन्होंने भगवान श्रीराम, भगवान बुद्ध और तीर्थंकर महावीर से लेकर सम्राट अशोक तक के नामों को याद किया तथा बिहार की ऐतिहासिक विरासत पर विशेष बल दिया। लेकिन जिन हाथों ने इन चित्रों को संविधान के पन्नों पर जीवंत किया, जिनकी अप्रतिम कूची ने इन्हें जीवतंता के साथ उकेरा, उनका नाम उपमुख्यमंत्री जी को शायद याद नहीं रहा। उन महान चित्रकार का नाम उनके व्याख्यान में शामिल नहीं हो सका।


14 मिनट के अपने संबोधन में उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने कहा कि भारतीय संविधान केवल विधिक दस्तावेज नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर भी है। दरअसल, उन्होंने इस संबोधन में अपने 20 माह के कार्यकाल में की गयी अपनी उपलब्धियों को गिनाया। इसी उपलब्धि में उन्होंने संविधान की प्रति बांटे जाने का भी जिक्र किया। उन्होंने आगे बताया कि इसे लेकर विधानसभा के एक मानयीय सदस्य ने भगवान श्रीराम को ‘काल्पनिक’ बताया था। हालांकि, उन्होंने काल्पनिक बताने वाले सदस्य का नाम नहीं लिया। इसी ‘वाकये’ को लेकर उन्होंने संविधान के 22 अध्यायों के बारे में जानकारी दी तथा कहा कि इसके तीसरे अध्याय में भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के चित्र बने हुए हैं। यह अध्याय मौलिक अधिकारों पर आधारित है। चौथा अध्याय भी मौलिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है और इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के चित्र हैं। उन्होंने कहा कि 22 में से 6-7 अध्याय ऐसे हैं, जिन पर बनाये गये चित्र बिहार से जुड़े हैं।

सशक्त विधायक, सशक्त लोकतंत्र विषयक इस कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने यह स्वीकार किया- ‘संविधान में सर्वाधिक चित्र बिहार से जुड़े चरित्रों के हैं’। लेकिन उन्होंने इन चित्रों को उकेरने वाले मास्टर मोशाय के नाम से लोकप्रिय बिहार के लाल आचार्य नंदलाल बसु को ही भूल गये। दरअसल, संविधान की मूल प्रति का कलात्मक अलंकरण विश्वप्रसिद्ध कलाकार आचार्य नंदलाल बसु ने किया था। प्रत्येक अध्याय के आरंभ में जो चित्र उकेरे गए हैं, वे भारतीय सभ्यता की क्रमिक यात्रा को दर्शाते हैं। यह कार्य संविधान निर्माण की प्रक्रिया का औपचारिक हिस्सा था, न कि केवल सजावटी उपक्रम। बता दें कि आचार्य नंदलाल बसु का जन्म बिहार के मुंगेर जिले के हवेली खड़गपुर में हुआ था। प्रारम्भिक पढ़ाई के बाद वे आगे की पढ़ाई के लिए पश्चिम बंगाल चले गये। बाद में वे शांति निकेतन में कला गुरु बने। रवींद्रनाथ टैगोर उर्फ रवींद्रनाथ ठाकुर के बड़े भाई अवनींद्र नाथ ठाकुर के आमंत्रण पर वे वहां पहुंचे थे और भारतीय कला के आधुनिक पुनर्जागरण के प्रमुख हस्ताक्षर बने। टैगोर और नंदलाल बसु के बीच रचनात्मक संबंध का उल्लेख कला इतिहास में विशिष्ट स्थान रखता है। शांति निकेतन की दीवारों पर उकेरे चित्र उनकी यादों को संजोये हुए हैं।


हालांकि, उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा का व्याख्यान सांस्कृतिक प्रतीकों से समृद्ध था और बिहार को लेकर सारगर्भित था। चुनावी परिप्रेक्ष्य में यह ऐतिहासिक चेतना के पुनर्स्मरण का संकेत भी देता था। ऐसे समय में यदि संविधान के चित्रों के साथ उनके चित्रकार के नाम का भी उल्लेख होता, तो इससे बिहार की सांस्कृतिक विरासत और अधिक गौरवान्वित होती तथा इसकी गूंज पश्चिम बंगाल तक जाती। यह जगजाहिर है कि संविधान की मूल प्रति केवल कानून का संहिता-पुस्तक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मकथा भी है और उस आत्मकथा के पन्नों को कलात्मक स्वरूप देने वाला कलाकार बिहार की धरती से जुड़ा था, यह तथ्य अपने आप में उल्लेखनीय है।
बहरहाल, सियासी पंडित भी मानते हैं कि यदि उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा अपने वक्तव्य में आचार्य नंदलाल बसु का उल्लेख करते और उनके बिहार में जन्म तथा शांति निकेतन से जुड़े योगदान का संदर्भ जोड़ते, तो यह सांस्कृतिक सेतु का संदेश बन सकता था। इतना ही नहीं, इससे जहां बिहार की ऐतिहासिक अस्मिता को बल मिलता, वहीं पश्चिम बंगाल से जुड़ी साझा विरासत का भी संकेत जाता। बेशक इससे हाल ही में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर एक सियासी माहौल बनता। बता दें कि जिस तरह, रवींद्रनाथ टैगोर वहां ‘रवींद्रनाथ ठाकुर’ के नाम से भी प्रचलित हैं, उसी प्रकार आचार्य नंदलाल बसु वहां ‘नंदलाल बोस’ के नाम से भी जाने जाते हैं।





