परमात्मा में लीन हुए आत्मा बाबू, काशी मणिकर्णिका पर चंद्र-सूर्य बने साक्षी; क्या पहले ही लिख दी थी अपनी विदाई !

Rajesh Thakur | Patna

कभी-कभी जीवन अपने अंतिम पड़ाव पर ऐसी कहानी रच देता है। यह सामान्य शोक-संदेश से आगे बढ़कर एक आध्यात्मिक आख्यान बन जाती है। मुंगेर जिले के हवेली खड़गपुर प्रखंड अंतर्गत घोषपुर गांव निवासी और रामायण रिसर्च काउंसिल के ट्रस्टी आत्मानंद सिंह की अंतिम यात्रा भी कुछ ऐसे आध्यात्मिक प्रसंगों और संयोगों से गुजरी। उनकी अंतिम यात्रा भी कुछ ऐसी ही अनोखी और संकेतों से भरी रही। दरअसल, आत्मानंद सिंह को लोग स्नेह से ‘आत्मा बाबू’ कहते थे। 78 वर्ष की आयु में पटना के एक निजी अस्पताल में शनिवार की आधी रात में उनका निधन हुआ। निधन के कुछ घंटा पहले ही पापमोचिनी एकादशी शुरू हुई थी। लेकिन उनके जीवन का अंतिम अध्याय भगवान भोलेनाथ की नगरी काशी में एक अद्भुत संयोग के साथ पूर्ण हुआ।

मणिकर्निका घाट पर अंतिम संस्कार के समय उदित हुआ सूर्य, कर्मकांड निभाते पुत्र संजीव सिंह व पोता मन्नू सिंह।
दाह संस्कार के समय सूर्योदय से पहले चंद्रमा भी हुआ उदय। फोटो : सभी फोटो मुखियाजी

मणिकर्णिका पर ब्रह्ममुहूर्त और प्रकृति की मौन उपस्थिति के बीच आत्मा बाबू का दाह संस्कार संपन्न हुआ। सुबह 4:40 बजे जैसे ही अग्नि-संस्कार की प्रक्रिया शुरू हुई, उसी के महज आधे घंटे के बाद सामने आकाश में द्वादशी का चंद्रमा उदित हुआ। और उसके अस्त होने के बाद उसी क्षितिज पर भगवान सूर्यदेव का भी उदय हुआ। मानो चंद्र और सूर्य, दोनों ही इस अंतिम यात्रा के साक्षी बन गए हों। दोनों ही तस्वीरें कैमरे में कैद हो गयीं। यह भी अद्भुत संयोग कि लगभग सवा दो घंटे में ही दाह-संस्कार पूरा हो गया, जो काफी अच्छा माना जाता है। वैसे एक दाह संस्कार में अमूमन साढ़े तीन घंटे का समय लगता है। यह जगजाहिर है कि भारतीय परंपरा में बनारस (काशी) केवल एक शहर नहीं, बल्कि भोलेनाथ के त्रिशूल पर बसा मोक्ष का द्वार माना जाता है। मणिकर्णिका घाट का नाम आते ही एक ऐसी आस्था का बोध होता है, जहां मृत्यु अंत नहीं, बल्कि मुक्ति का मार्ग बन जाती है। आत्मा बाबू की यह इच्छा कि उनकी अंतिम सांस ‘बाबा नगरी’ में टूटे, और फिर उसी स्थल पर उनका दाह संस्कार होना, इसे संयोग कहें या संकल्प की परिणति, यह विचारणीय है।

यह पूरी घटना को और भी रहस्यमयी बनाता है वह संदेश, जो आत्मा बाबू ने अपने पोते ‘मन्नू’ को निधन से करीब पांच दिन पहले लिखा था। उस संदेश में उन्होंने लिखा था कि परमात्मा मुझे अपने में लीन कर लें। मेरे कर्मों में कोई त्रुटि हुई हो तो क्षमा करें और अपने चरणों में स्थान देकर मोक्ष प्रदान करें। मुझे मुक्ति का मार्ग दें। मुझे मोक्ष प्रदान करें। सिर्फ इतना ही नहीं, वे अक्सर अपने परिजनों से यह भी कहते थे कि उनकी अंतिम सांस बाबा की नगरी बनारस में ही टूटे। उनके पुत्र संजीव सिंह बताते हैं कि पिताजी जब जिंदा थे, तो उन्होंने एक बार कहा था कि उनका अंतिम संस्कार बनारस के मणिकर्णिका घाट पर हो। दरअसल, काशी का मणिकर्णिका घाट हिंदू आस्था में केवल एक श्मशान घाट नहीं, बल्कि मोक्ष का द्वार माना जाता है। मान्यता है कि यहां दाह संस्कार होने से आत्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाती है। पुराणों में भी उल्लेख है कि स्वयं भगवान शिव यहां तारक मंत्र का उपदेश देते हैं, जिससे आत्मा को परम शांति प्राप्त होती है। तारक मंत्र से पार्थिव शरीर के दाँया कान पर सीधा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में आत्मा बाबू का यहां अंतिम संस्कार, और वह भी ब्रह्ममुहूर्त में, आस्था और संयोग, दोनों को एक साथ जोड़ देता है।

बहरहाल, आत्मानंद सिंह केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि गहन धार्मिक और साहित्यिक सोच वाले व्यक्ति थे। रामायण रिसर्च काउंसिल के कार्यों में उनकी सक्रिय भूमिका रही। हाल ही में महाकुंभ पर तैयार किए गए विशाल साहित्यिक संकलन में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान था। वे संस्था के मजबूत स्तंभ थे और सीतामढ़ी के पुनौराधाम स्थित श्रीरामजानकी स्थान के विकास को लेकर भी बेहद चिंतित रहते थे। आत्मा बाबू की अंतिम यात्रा केवल एक व्यक्ति का विदा होना नहीं, बल्कि एक ऐसी कथा बन गयी है, जिसमें आस्था, संयोग और आत्मबोध तीनों साथ चलते नजर आते हैं। चंद्रमा का उदय, सूर्य का साक्ष्य, काशी की पवित्र भूमि और पहले से लिखा गया वह आत्मिक संदेश; ये सब मिलकर एक ही प्रश्न छोड़ जाते हैं- ‘क्या आत्मा बाबू को सच में अपने परलोक गमन का पूर्वाभास हो गया था?’