Durga Puja 2026 : नौ देवियों की नौ सीख, नवरात्र में माँ के हर रूप से जीवन के लिए मिलती है यह खास प्रेरणा; जानते हैं आचार्य ब्रजेश मिश्र से

Radio Mukhiyajee | Patna

नवरात्र के नौ दिन माँ दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों को समर्पित हैं। पूरे बिहार सहित देशभर में दुर्गापूजा की चहल-पहल बढ़ गयी है। आज गुरुवार को माँ के पंचम स्वरूप स्कन्दमाता की पूजा की जा रही है। ख्यातिलब्ध युवा आचार्य ब्रजेश मिश्र ने कहा कि लोकप्रिय नवरात्र-परंपरा में शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा होती है। उनके अनुसार इन्हें भक्ति की दृष्टि से देखें तो हर रूप साधक को जीवन के लिए एक विशेष प्रेरणा देता है। उन्होंने बताया कि पहले स्वरूप शैलपुत्री स्थिरता की प्रेरणा देती हैं, यानी कठिन समय में भी अपने स्थान और संकल्प पर टिके रहना।

वे बताते हैं कि माँ के दूसरे स्वरूप ब्रह्मचारिणी तप और अनुशासन की याद दिलाती हैं। तीसरी चन्द्रघण्टा साहस का और चौथी कूष्माण्डा सृजनशीलता का संदेश देती हैं। पाँचवीं स्कन्दमाता वात्सल्य का स्मरण कराती हैं। छठे स्वरूप कात्यायनी अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की शक्ति देती हैं। सातवीं कालरात्रि भय का सामना करने का सामर्थ्य सिखाती हैं। आठवीं महागौरी शुद्धता की और नौवीं सिद्धिदात्री साधना की परिपक्वता की स्मृति दिलाती हैं। यह भावात्मक व्याख्या साधना को रोजमर्रा के जीवन से जोड़ती है। केवल देवी का नाम लेना पर्याप्त नहीं है। पूजा के साथ यदि मनुष्य अपने व्यवहार में धैर्य, अपने विचारों में पवित्रता और अपने कर्मों में न्याय को स्थान देता है, तब नवरात्र की आध्यात्मिक प्रेरणा जीवन में दिखने लगती है।

आचार्य मिश्र ने कहा कि जो व्यक्ति नौ दिनों तक हर स्वरूप की सीख को अपने आचरण में उतारने का प्रयास करे, उसके लिए नवरात्र केवल उपवास या अनुष्ठान का पर्व नहीं रहता, बल्कि आत्मविकास का अवसर बन जाता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि प्रतिदिन उस दिन की देवी के गुण को अपने जीवन में एक छोटे संकल्प के रूप में अपनाएँ। साथ ही उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पूजा की विधियाँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग हो सकती हैं, पर श्रद्धा, शक्ति का सम्मान और अधर्म पर धर्म की विजय का भाव सभी परंपराओं के मूल में एक ही है।