अलार्म की जगह जब सुकून ने जगाया, डॉ. अखिलेश कुमार की सेवानिवृत्ति के बाद पहली सुबह; दफ्तर की चिंता न फाइलों का बोझ

Rajesh Thakur | Mukhiyajee Reporter

1 जुलाई 2026 : आज की सुबह डॉ. अखिलेश कुमार के लिए कुछ अलग थी। आज तो सुबह चार बजे ही उनकी आँख खुल गयी। सुबह तो वे रोज ही उठते रहे हैं, लेकिन आज जागने के बाद उन्हें कहीं निकलने की जल्दी नहीं थी। घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ रही थीं, मगर मन पर समय का कोई दबाव नहीं था। न 10 बजे तक कार्यालय पहुँचने की चिंता, न फाइलों का बोझ और न ही किसी प्रशासनिक जिम्मेदारी का तनाव। यह सूर्योदय उनके जीवन का पहला ऐसा सूर्योदय था, जब वे सरकारी सेवा से मुक्त होकर एक नए जीवन की दहलीज पर खड़े थे। 30 जून को माँ सीता की पावन धरती सीतामढ़ी से सिविल सर्जन के पद से सेवानिवृत्त होने वाले डॉ. अखिलेश कुमार ने मुखियाजी डॉट कॉम से बातचीत में कहा, ‘आज मैं खुद को बहुत हल्का महसूस कर रहा हूँ। समझ में ही नहीं आ रहा है कि क्या करूँ…’ यह कहते-कहते वे भावुक हो गये। शब्द कम पड़ने लगे और यादें बोलने लगीं। बता दें कि जब डॉ अखिलेश कुमार ने अपने प्रारंभिक करियर में हवेली खड़गपुर में थे तो मैं लोकप्रिय अखबार ‘हिंदुस्तान’ में स्थानीय पत्रकार था और उनके साथ कई सामाजिक कार्यों में शामिल रहा हूँ।

सुकून की चाय : डॉ अखिलेश कुमार ने सबसे पहले अपनी पत्नी को आवाज दी। दोनों ने साथ बैठकर चाय पी। यह उनके जीवन की शायद सबसे सुकून भरी चाय थी। वर्षों तक दूसरों के स्वास्थ्य की चिंता में बीती सुबहों के बीच यह पहला अवसर था, जब वे बिना किसी जल्दबाजी, बिना किसी फोन कॉल और बिना किसी सरकारी दायित्व के इत्मीनान से बैठ सके। एक चिकित्सक का जीवन केवल नौकरी नहीं होता, वह एक निरंतर जिम्मेदारी होती है। लेकिन आज पहली बार जिम्मेदारियों की उस लंबी यात्रा के बाद उन्हें ठहरकर सुबह को महसूस करने का अवसर मिला। दरअसल, उनकी सरकारी सेवा की शुरुआत 17 फरवरी 1990 को मुंगेर की ऐतिहासिक धरती से हुई थी। तब उन्होंने हवेली खड़गपुर में एक युवा चिकित्सक के रूप में जिस सपने और समर्पण के साथ अपना पहला कदम बढ़ाया था, वही संकल्प उन्हें लगातार आगे ले गया। फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मुंगेर, बांका और सीतामढ़ी; तीनों जिलों की मिट्टी उनके जीवन और सेवा यात्रा की साक्षी रही है। मुंगेर में उन्होंने सिविल सर्जन का प्रभार भी संभाला, जबकि सीतामढ़ी में लगभग डेढ़ वर्ष तक सिविल सर्जन के रूप में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया।

डॉ अखिलेश कुमार को बुके देकर शुभकामना देते सहयोगी।
अपने कार्यकाल के अंतिम दिन दफ्तर में डॉक्टर साहेब।
अपने सहकार्मियों के साथ सिविल सर्जन डॉ अखिलेश कुमार।

ईमानदारी और सादगी उनकी पहचान : डॉ साहेब के पूरे सेवाकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही रही कि उन्होंने अपनी ईमानदारी और सादगी को कभी समझौते का विषय नहीं बनने दिया। तीन दशक से अधिक लंबे करियर में उनके दामन पर किसी प्रकार का कोई दाग नहीं लगा। उन्होंने चिकित्सा को पेशा नहीं, बल्कि लोकसेवा का माध्यम माना। आज जब वे अपने सरकारी जीवन को पीछे मुड़कर देखते हैं, तो संतोष उनके चेहरे पर साफ दिखाई देता है। उनके लिए यह भी किसी सौभाग्य से कम नहीं कि नौकरी की अंतिम पारी में उन्हें माँ सीता की जन्मभूमि पर सेवा करने का अवसर मिला। मुखियाजी डॉट कॉम को वे गर्व के साथ कहते हैं कि सीतामढ़ी से सेवानिवृत्त होना उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहेगा। उनकी भावनाओं में हवेली खड़गपुर और सीतामढ़ी, दोनों बराबर बसे हुए हैं। एक ने उन्हें कर्म का विस्तार दिया तो दूसरे ने जीवन के इस महत्वपूर्ण अध्याय का सुंदर समापन।

शुभकामनाओं का लगा ताँता : इधर, सेवानिवृत्ति के अगले ही दिन लोगों का उनके आवास पर पहुँचने का सिलसिला शुरू हो गया। कोई शुभकामनाएँ देने आया, कोई धन्यवाद कहने और कोई सिर्फ एक बार हाथ मिलाकर वर्षों की सेवाओं के प्रति सम्मान व्यक्त करने। उधर, हवेली खड़गपुर के लोग भी डॉक्टर साहेब के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि अब डॉक्टर साहेब का अनुभव और समय समाज के लिए नए रूप में उपलब्ध होगा। भागलपुर जिले के कहलगाँव प्रखंड स्थित बढ़ोइया गाँव के निवासी डॉ. अखिलेश कुमार का परिवार लंबे समय से सार्वजनिक जीवन से जुड़ा रहा है। उनके बड़े भाई अंबिका प्रसाद छह बार विधायक रहे, लेकिन डॉक्टर साहेब ने अपनी अलग पहचान अस्पतालों के गलियारों, मरीजों की दुआओं और प्रशासनिक ईमानदारी के बल पर बनायी। सेवानिवृत्ति के बाद वे क्या करेंगे, इसका कोई विस्तृत खाका अभी तैयार नहीं है। मगर एक बात वे पूरे विश्वास के साथ कहते हैं- ‘समाजसेवा का काम जीवन भर चलता रहेगा। पद खत्म हो सकता है, सेवा का संकल्प नहीं।’

36 वर्षों की यात्रा की गरिमा : बहरहाल, आज उनकी सुबह में कोई सरकारी गाड़ी नहीं थी, कोई मीटिंग नहीं थी, कोई आदेश नहीं था। फिर भी यह सुबह उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सुबहों में शामिल हो गयी। क्योंकि, कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि किसी नए पद को प्राप्त करना नहीं, बल्कि ईमानदारी और सम्मान के साथ एक लंबी यात्रा को पूर्ण करना होता है। और, डॉ. अखिलेश कुमार ने अपनी 36 वर्षों की यात्रा को ठीक उसी गरिमा, सादगी और संतोष के साथ पूरा किया है। आज उनके जीवन में सचमुच एक नया सूरज उगा है- ‘कर्तव्य से मुक्ति का नहीं, बल्कि सेवा के एक नए, अधिक मानवीय और अधिक आत्मीय अध्याय का सूरज।’ मुंगेर की ऐतिहासिक धरती हवेली खड़गपुर से शुरू हुई सेवा यात्रा का पड़ाव माँ सीता की पावन जन्मभूमि पर आकर पूरा हुआ, लेकिन जनसेवा का संकल्प अब भी पहले जैसा अडिग है।