
Ajeet Kumar | Patna (Fulwari Sharif)
सुबह की हल्की ठंडक, सहरी के लिए जलती रसोई और घरों में धीमी आवाज में की जा रही दुआएं। आम तौर पर इन पलों में बच्चे नींद में होते हैं, लेकिन फुलवारी शरीफ के कई घरों में इस बार वे इबादत कर रहे हैं, सुख-समृद्धि के लिए अम्मी-अब्बू संग दुआएं मांग रहे हैं। पांच साल की उरूज आफताब, सात साल के मोहम्मद हंजल, तलहा मसूद और छह वर्षीया अनाया फातिमा ने रोजा रखकर परिवार और समाज को सब्र, अनुशासन और आस्था का संदेश दे रहे हैं। मासूम रोजेदारों की इस पहल से परिवारों में खुशी का माहौल है। लोगों का कहना है कि सही मार्गदर्शन और हौसला मिले तो बच्चे भी छोटी उम्र में बड़े काम कर सकते हैं। ये बच्चे मिसाल पेश कर रहे हैं।

उरूज आफताब : फुलवारी शरीफ के नया टोला की रहने वाली पांच साल की उरूज आफताब ने इस साल अपना पहला रोजा रखा है। सुबह सहरी के वक्त वह परिवार के साथ उठती है और पूरे दिन सब्र और हिम्मत के साथ उसे मुकम्मल करती है। घर के लोगों को शुरू में तो भरोसा ही नहीं था कि इतनी छोटी बच्ची पूरा रोजा रख पाएगी, लेकिन उरूज ने बिना किसी शिकायत के दिनभर रोजा रख रही है। शाम को इफ्तार के वक्त भी वह अपने परिवार के साथ रोजा खोलती है। पहला दिन तो इफ्तार के वक्त घर का माहौल भावुक और खुशनुमा हो गया था। सभी ने उसे दुआओं और आशीर्वाद से नवाजा. बता दें कि उरूज आफताब फुलवारी नगर परिषद के पूर्व वार्ड पार्षद मो. कौसर खान की पोती है। एलकेजी में पढ़ने वाली उरूज ने कम उम्र में ही धार्मिक संस्कारों की मिसाल पेश की है।

मोहम्मद हंजल हुसैन : फुलवारी शरीफ के हारूननगर सेक्टर–2 निवासी सात साल के मोहम्मद हंजल हुसैन की भी पहला रोजा रखने की वजह से खूब चर्चा हो रही है। कम उम्र में रोजा रखकर उन्होंने अल्लाह की रजा के लिए इबादत की और शाम तक सब्र के साथ रोजा पूरा किया। उनकी अम्मी जीनत तबस्सुम ने बताया कि बेटे ने सात साल की उम्र में रोजा रखकर परिवार को गर्व का मौका दिया है। सेहरी के वक्त तो वह सबसे पहले उठकर तैयार रहता है। उन्होंने कहा कि बच्चों को बचपन से ही रोजा, नमाज और दीनी तालीम की आदत डालनी चाहिए, ताकि उनमें अच्छे संस्कार विकसित हों। इफ्तार के वक्त भी बड़ा इत्मीनान से रहता है और घर के लोगों को देखकर वह भी रोजा खोलता है। परिवार और मोहल्ले के लोगों ने हंजल की हौसला अफजाई की और उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए दुआ की।

तलहा मसूद : तलहा मसूद का भी यह पहला रोजा है। उसकी मासूमियत पर पूरा परिवार भावुक हो जाता है। तलहा मसूद सेहरी करने की उत्सुकता में वह सुबह जल्दी उठ जाता है और हाथ-मुंह धोकर पूरे जोश के साथ तैयार रहता है। पहला दिन तो उसे इस बात का अंदाजा नहीं था कि पूरे दिन बिना खाए-पिए रहना कितना कठिन होगा। सुबह से ही भूख और प्यास का एहसास शुरू हो गया, जो दोपहर और शाम तक बढ़ता गया। इसके बावजूद तलहा ने नमाज, तिलावत और हल्के खेल-कूद के जरिए अपना समय गुजारा। परिवार वाले उसके हौसले और मुस्कुराते चेहरे को देखकर हैरान और खुश थे। अल्लाह के करम से तलहा ने अपना पहला रोजा पूरा किया और बड़ों के संग इबादत की। परिजनों ने उसके उज्ज्वल भविष्य और लंबी उम्र की दुआ की।

अनाया फातिमा : ग्राम नोहसा, फुलवारी शरीफ की रहने वाली छह वर्षीया अनाया फातिमा भी किसी से कम नहीं है। उसने भी रमजान में रोजा रखकर सबका दिल जीत लिया। वह मोहम्मद खैरउद्दीन अरमान की बेटी और मोहम्मद अलाउद्दीन साहब की पोती हैं। परिवार में धार्मिक परंपराओं का माहौल रहा है, जिसका असर अनाया पर साफ दिखता है। कम उम्र में रोजा रखना और नमाज अता करना उसकी धार्मिक जागरूकता और परिवार की दीनी तालीम का प्रमाण है। दादा और पिता ने हमेशा इस्लामी मूल्यों को घर में स्थापित किया, जिससे अनाया को प्रेरणा मिली। इफ्तार के बाद पूरे परिवार ने मुल्क में अमन-चैन, तरक्की और भाईचारे की दुआ मांगी। स्थानीय लोगों ने भी अनाया के उज्ज्वल भविष्य के लिए कामना की। वे इसे प्रेरणादायक कदम बता रहे हैं।








