Rajesh Thakur | Patna
पटना की सड़कों पर आम दिनों की तरह अन्य वाहनों की तरह सवारी ऑटो भी चल रहे थे। कहा जाता है बिहार के जर्रे-जर्रे में सियासत समाया हुआ है। ऐसा ही सियासी नजारा पहाड़ी से अनिसाबाद जा रहे एक सवारी ऑटो में देखने को मिला। उसने बिहार की असाधारण सियासत की नब्ज जैसे एक झटके में पकड़ ली। यात्रियों के बीच बिहार के नए मुख्यमंत्री पर भी चर्चा हुई। नए नाम पर कोई-कुछ बोल पाता, इससे पहले ऑटो ड्राइवर की हाजिरजवाबी ने सबकी बोलती बंद कर दी। तब तक डिस्टनेशन आ गया था, सारे यात्री अपनी-अपनी राह पकड़ लिये। ऑटो ड्राइवर फिर नए यात्रियों की तलाश में जुट गया। अब वाकया विस्तार से बताते हैं।
दरअसल, मुझे गोलब्लाडर में स्टोन है। ऑपरेशन होना है। AIIMS से डेट मिल नहीं पा रहा है। फरवरी के दूसरे सप्ताह में अचानक दर्द उठा। यह दोबारा दर्द था। तब सबों ने कहा कि बिना ऑपरेशन ठीक नहीं होगा। 26 फरवरी को दिखाया। जुगाड़ लगाने के बाद भी अल्ट्रासाउंड की तारीख डेढ़ माह बाद यानी 11 अप्रैल को मिली। निर्धारित समय पर अल्ट्रासाउंड तो करा लिया, लेकिन बाकी टेस्टों की रसीद बिलिंग स्टॉफ की ‘लापरवाही’ से नहीं कटा। उसी को लेकर आज सोमवार को ऑटो से AIIMS Patna जा रहा था तो यह ‘सियासी वाकया’ हो गया। जगनपुरा से एम्स पटना की ओर बढ़ते उस सफर में बातचीत का विषय भी वही था, जो इन दिनों हर चौक-चौराहे पर है, कौन होगा बिहार का अगला मुख्यमंत्री? ऑटो में बैठे यात्रियों के बीच चर्चा का दायरा बड़ा था। नरेंद्र मोदी से लेकर नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव तक, मुद्दे बदलते रहे। कभी नालंदा विश्वविद्यालय की विरासत की बात उठी, तो कभी बख्तियार खिलजी का जिक्र हुआ। यहां तक कि पश्चिम बंगाल के चुनावी समीकरणों तक चर्चा जा पहुंची। फिर गैस सिलिंडर के लिए हो रही परेशानी भी मुद्दा बना।



इसी बीच मुद्दा बदला और वह बिहार के नए सियासी घटनाक्रम पर आ गया। बात हुई नीतीश कुमार के संभावित इस्तीफे पर। एक यात्री ने सहजता से कहा, ‘लगता है, कल 14 अप्रैल को ही नीतीश कुमार इस्तीफा देंगे।’ इसके बाद स्वाभाविक सवाल उभरा- ‘अब नया मुख्यमंत्री कौन?’ जवाब तलाशने की कोशिश चल ही रही थी, शब्द अभी आकार ले ही रहे थे। यात्री अपने-अपने हिसाब से जवाब देने की सोच रहे थे। कोई यात्री कुछ बोलता, इसके पहले ही ऑटो ड्राइवर ने तपाक से कहा- ‘सम्राट चौधरी बनेंगे… और कौन!’ उसका यह आत्मविश्वास भरा जवाब कुछ पल के लिए पूरी बातचीत पर भारी पड़ गया। न कोई राजनीतिक विश्लेषण, न लंबी बहस; सिर्फ सीधा जवाब।
बहरहाल, सम्राट चौधरी का नाम इस तरह सहजता से लेना, अपने आप में संकेत है कि जमीनी स्तर पर उनकी दावेदारी कितनी मजबूती से चर्चा में है। यह केवल राजनीतिक गलियारों की रणनीति नहीं, बल्कि आम लोगों की बातचीत में भी शामिल हो चुका एक नाम है। सियासी पंडित अपनी जगह, दो धाराओं में बंटी मीडिया अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन चुनावी लोकतंत्र में असली ताकत उस धारणा की होती है, जो आम लोगों के बीच बनती है। पटना की उस ऑटो सवारी में उभरी आवाज यही बताती है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर चल रही चर्चाएं अब सिर्फ नेताओं और रणनीतिकारों तक सीमित नहीं रहीं, वे आम जनता की जुबान पर आ चुकी हैं। बस चंद घंटों में पता चल जाएगा कि आने वाले दिनों में सत्ता के गलियारों में जो फैसला होगा, क्या वह इस ‘ऑटो ड्राइवर वाले आत्मविश्वास’ से मेल खाता है या नहीं। बिहार की सियासत का अगला अध्याय भले ही बंद कमरों में लिखा जाए, लेकिन सम्राट चौधरी के रूप में उसकी झलक सड़क पर जरूर दिखाई देने लगी है।





