Mukhiyajee Reporter | Bhagalpur
दीपावली की रात बिहार के गांवों में दीयों की कतार के साथ एक और रोशनी देखने को मिलती है, जो हाथ में उठायी जाने वाली मशाल की होती है। इसे हुक्का-पाती कहते हैं। इसे हुक्का पाटी, उक्का-पाती और हुक्का लोहारी के नाम से भी जाना जाता है। यह प्राचीन परंपरा मिथिला, कोसी और सीमांचल के साथ-साथ भागलपुर समेत पूरे अंग प्रदेश में निभायी जाती है। आइए जानते हैं कि हुक्का-पाती क्या है, कैसे बनती है और इसके पीछे क्या मान्यताएं हैं। दरअसल, हुक्का-पाती एक छोटी देसी मशाल है, जिसे बनाने के लिए जूट यानी पटसन के पौधे की सूखी डंठल का इस्तेमाल होता है। गांव की बोली में इस डंठल को सनाठी या सनसनाठी कहते हैं। इसके साथ सूखी घास या खर भी जुटाई जाती है। सन की रस्सी से सनाठी की कई डंठलों को आपस में कसकर बांध दिया जाता है। इस तरह एक डंडे जैसी मशाल तैयार हो जाती है।

खास बात यह है कि इसे बनाने में बाजार से कुछ खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि सारी सामग्री खेत-खलिहान से ही मिल जाती है। हालांकि, शहर में अब इसकी भी बिक्री होने लगी है। अब तो यह कुछ शहरों में बना-बनाया भी मिलने लगा है। कहा जाता है कि दीपावली की रात मां लक्ष्मी की पूजा के बाद घर के पुरुष सदस्य जलती हुई हुक्का-पाती हाथ में लेते हैं। वे घर के कोने-कोने में घूमते हैं और मुख्य द्वार पर पहुंचकर जोर से उद्घोष करते हैं- “लक्ष्मी घर, दरिद्र बाहर।” मान्यता है कि ऐसा करने से घर की दरिद्रता दूर होती है और मां लक्ष्मी का वास होता है। कई घरों में बच्चे भी साथ चलते हैं और यही उद्घोष दोहराते हैं।





यह भी कहा जाता है कि इस परंपरा का एक बड़ा उद्देश्य पूर्वजों को श्रद्धा के साथ विदा करना भी माना जाता है। पितृपक्ष या महालय में जो पितर धरती पर आते हैं, उन्हें दीपावली की रात प्रकाश दिखाकर विदाई दी जाती है, ताकि उन्हें शांति और मोक्ष मिले। इसी भाव से जलती हुई हुक्का-पाती को आकाश की ओर ऊपर-नीचे भी किया जाता है। इस तरह एक ही परंपरा में लक्ष्मी का आह्वान और पितरों का स्मरण, दोनों शामिल हैं। बहरहाल, मिथिलांचल से शुरू हुआ यह पर्व आज भागलपुर प्रक्षेत्र तक फैल गया है। इतना ही नहीं, दूसरे राज्यों में रहने वाले इस इलाके के लोग वहां भी हुक्का-पाती की परंपरा को निभा रहे हैं। लेकिन, मधुबनी, दरभंगा, पूर्णिया, कटिहार, मुंगेर, भागलपुर, बांका, जमुई आदि शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इसे काफी उत्साह के साथ मनाते हैं। गांवों के बुजुर्ग चाहते हैं कि नयी पीढ़ी भी इस परंपरा को जाने और आगे बढ़ाए, क्योंकि यह त्योहार को केवल रोशनी का पर्व नहीं रहने देती, बल्कि अपनी मिट्टी, अपनी परंपरा और अपने पुरखों से जोड़ने का काम भी करती है। हालांकि न्यू-जेन इसे कितना स्वीकार करते हैं, यह भविष्य के गर्भ में हैं।






