Radio Mukhiyajee Reporter
नवरात्र के नौ दिन माँ दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों को समर्पित हैं। आज कहीं अष्टमी है तो कहीं नवमी है। बिहार के ख्यातिलब्ध युवा ज्योतिष व तारापुर निवासी आचार्य ब्रजेश मिश्र ने कहा कि लोकप्रिय नवरात्र-परंपरा में शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा होती है। उनके अनुसार इन्हें भक्ति की दृष्टि से देखें तो हर रूप साधक को जीवन के लिए एक विशेष प्रेरणा देता है। उन्होंने बताया कि पहले स्वरूप शैलपुत्री स्थिरता की प्रेरणा देती हैं, यानी कठिन समय में भी अपने स्थान और संकल्प पर टिके रहना। दूसरे स्वरूप ब्रह्मचारिणी तप और अनुशासन की याद दिलाती हैं। तीसरी चन्द्रघण्टा साहस का और चौथी कूष्माण्डा सृजनशीलता का संदेश देती हैं। पाँचवीं स्कन्दमाता वात्सल्य का स्मरण कराती हैं। छठे स्वरूप कात्यायनी अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की शक्ति देती हैं। सातवीं कालरात्रि भय का सामना करने का सामर्थ्य सिखाती हैं। आठवीं महागौरी शुद्धता की और नौवीं सिद्धिदात्री साधना की परिपक्वता की स्मृति दिलाती हैं।
आचार्य मिश्र ने कहा कि यह भावात्मक व्याख्या साधना को रोजमर्रा के जीवन से जोड़ती है। उनके अनुसार केवल देवी का नाम लेना पर्याप्त नहीं है। पूजा के साथ यदि मनुष्य अपने व्यवहार में धैर्य, अपने विचारों में पवित्रता और अपने कर्मों में न्याय को स्थान देता है, तब नवरात्र की आध्यात्मिक प्रेरणा जीवन में दिखने लगती है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति नौ दिनों तक हर स्वरूप की सीख को अपने आचरण में उतारने का प्रयास करे, उसके लिए नवरात्र केवल उपवास या अनुष्ठान का पर्व नहीं रहता, बल्कि आत्मविकास का अवसर बन जाता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि प्रतिदिन उस दिन की देवी के गुण को अपने जीवन में एक छोटे संकल्प के रूप में अपनाएँ। साथ ही उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पूजा की विधियाँ परिवार, क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार अलग हो सकती हैं, पर श्रद्धा, शक्ति का सम्मान और अधर्म पर धर्म की विजय का भाव सभी परंपराओं के मूल में एक ही है।
शारदीय नवरात्र के अवसर पर आचार्य ब्रजेश मिश्र ने Radio Mukhiyajee को बताया कि देवी-भक्ति और आत्मजागरण की भावना से कुछ संस्कृत श्लोकों की रचना की है। उन्होंने कहा कि यह वंदना बड़ी अम्मा की कृपा से ही संभव हो पाती है। आचार्य ने स्पष्ट किया कि ये श्लोक प्राचीन शास्त्रों के उद्धरण नहीं हैं, बल्कि उनकी अपनी भक्ति की काव्यात्मक अभिव्यक्ति हैं। पहला श्लोक आदिशक्ति की वंदना में है, “या देवी जगतां शक्तिर्या देवी प्राणधारिणी। नमामि तां महादेवीं सर्वसिद्धिप्रदायिनीम्॥” इसका भावार्थ है कि जो देवी समस्त जगत की शक्ति और प्राणों की धारिणी हैं, उन महादेवी को मैं प्रणाम करता हूँ, जो साधक को सिद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ाने वाली हैं। दूसरा श्लोक अंतःशक्ति के जागरण पर है, “अन्तर्ज्योतिः समुत्पन्ना देवी बोधप्रदायिनी। तमसो नाशयेद् बुद्ध्या भक्तिं मुक्तिं च यच्छति॥” आचार्य के अनुसार इसका भाव यह है कि देवी की कृपा से अंतःकरण में ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है। वह प्रकाश विवेक के द्वारा अज्ञान का अंधकार दूर करता है और भक्ति तथा मुक्ति का मार्ग खोलता है। उन्होंने कहा कि नवरात्र की साधना का सार भी यही है कि बाहर की पूजा के साथ भीतर का दीप भी जले। तीसरा श्लोक नवरात्र-साधना को समर्पित है, “नवरात्रेषु भक्त्या त्वां पूजयामि जगन्मयि। शुद्धं कुरु मनो नित्यं शक्तिभक्तिं प्रयच्छ मे॥” इसका भावार्थ है कि हे जगन्मयी माता, इन नवरात्रियों में मैं भक्तिपूर्वक आपकी पूजा करता हूँ, मेरे मन को शुद्ध कीजिए और मुझे शक्ति के प्रति अटूट भक्ति प्रदान कीजिए।
आचार्य मिश्र ने कहा कि मंत्र अधरों पर गूँजे तो उसका प्रभाव विचारों में भी उतरना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि इन श्लोकों का पाठ करते समय उनके भाव पर भी मनन करें, ताकि उपासना केवल याचना न रहकर आत्मपरिवर्तन का संकल्प बन सके। इसी भाव से उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को शारदीय नवरात्र की शुभकामनाएँ दीं और जय माता दी का उद्घोष किया।




