Mukhiyajee Reporter | Patna
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आजादी के बाद के सबसे लंबे कार्यकाल वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री हो गए हैं। उनकी तुलना देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से की जा रही है। इसे लेकर सियासी गलियारे में ढेर कोलाहल मचा हुआ है। भाजपा इसे लेकर ‘12 साल बेमिसाल’ अभियान चला रही है। पूरे देश में भाजपा के मंत्रियों, नेताओं, कार्यकर्ताओं की ओर से पूजा-पाठ का दौर चल रहा है। दूसरी ओर, विपक्ष का कहना है कि कहां पंडित नेहरू और कहां नरेंद्र मोदी, कोई तुलना ही नहीं है। इस सियासी स्थिति पर बिहार के पुराने राजनीतिज्ञ शिवानंद तिवारी ने लंबा आलेख लिखे हैं, जो उनके सोशल मीडिया पोस्ट से साभार लिया गया है। अक्षरशः यहां प्रकाशित आलेख में लेखक व राजनीतिज्ञ शिवानंद तिवारी के निजी विचार हैं।
प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल की अवधि को पार कर लिया है। इसे लेकर काफी शोर मचाया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी नेहरू से आगे निकल गए। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या किसी शासक या प्रधानमंत्री का मूल्यांकन केवल इस आधार पर होना चाहिए कि वह कितने वर्षों तक सत्ता में रहा? या फिर कसौटी यह होनी चाहिए कि उसका शासनकाल छोटा हो या बड़ा, देश ने उस काल में क्या उपलब्धियाँ हासिल कीं?
इतिहास में दोनों तरह के उदाहरण मिलते हैं। औरंगजेब ने भारत पर सबसे लंबे समय तक शासन किया, लेकिन उनके शासनकाल को उपलब्धियों की दृष्टि से हम किस नजर से देखते हैं, यह सब जानते हैं। दूसरी ओर शेरशाह सूरी का उदाहरण है। उनका शासनकाल मात्र चार-पाँच वर्षों का रहा, लेकिन आज भी उनकी उपलब्धियों का उल्लेख किया जाता है। लाल बहादुर शास्त्री का उदाहरण भी सामने है। प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल बहुत छोटा था। उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले 1962 में चीन के साथ युद्ध में भारत को करारी हार का सामना करना पड़ा था। देश का मनोबल गिरा हुआ था। इस पृष्ठभूमि में शास्त्री जी को हल्के लेते हुए 1965 में पाकिस्तान ने हमारे देश पर हमला किया। छोटे कद के लाल बहादुर शास्त्री ने दृढ़ता के साथ देश का नेतृत्व किया। हमला कश्मीर की तरफ हुआ था। उन्होंने लाहौर की तरफ मोर्चा खोल दिया। उन्होंने कहा था कि अब लाहौर में चाय पिएंगे। युद्ध की स्थिति ऐसी बनी कि भारतीय सेना लाहौर के निकट तक पहुँच गयी थी। बाद में ताशकंद समझौते के उपरांत उनका निधन हो गया, लेकिन आज भी उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।
शास्त्री जी ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया, जो आज भी देश को प्रेरित करता है। एक बार किसी ने उनसे पूछा कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खान के सामने बातचीत करते समय उन्हें कैसा लगता है। शास्त्री जी की लंबाई पाँच फीट दो इंच थी जबकि अयूब खान की लंबाई 6 फीट 4 इंच थी। शास्त्री जी ने उत्तर दिया कि मैं उनसे बात करते समय अपनी नजर ऊपर उठाकर बात करता हूँ, जबकि उन्हें मुझसे बात करने के लिए अपनी नजर झुकानी पड़ती है। इसलिए यह कहना कि केवल कार्यकाल की लंबाई के आधार पर नरेंद्र मोदी ने जवाहरलाल नेहरू को पीछे छोड़ दिया है, अपने आप में कोई बड़ी उपलब्धि नहीं मानी जा सकती। असली प्रश्न यह है कि किसी नेता के शासनकाल में देश कहाँ पहुँचा। देश मजबूत हुआ या कमजोर? संकट के समय सरकार का प्रदर्शन कैसा रहा?
कोरोना की महामारी से लड़ाई के नाम पर मोदी जी ने देश भर में थाली बजवायी और मोबाइल की बत्ती जलवाई। कहा गया कि जैसे महाभारत का युद्ध अठारह दिनों में समाप्त हुआ था, वैसे ही कोरोना पर भी विजय प्राप्त कर ली जाएगी। कई अंधभक्तों ने तो कोरोना के उपचार में गोबर और गौ मूत्र बहुत कारगर उपाय बताया था, इसलिए किसी भी प्रधानमंत्री का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि वह कितने वर्षों तक पद पर रहा। इतिहास अंततः उसी को याद रखता है जिसने अपने कार्यकाल में ठोस उपलब्धियाँ हासिल की हों।बहरहाल, शेरशाह सूरी और लाल बहादुर शास्त्री जैसे उदाहरण हमें बताते हैं कि अल्पकालीन शासन भी इतिहास में अमर हो सकता है, यदि उसमें दूरगामी उपलब्धियाँ हों। इसलिए शासन की अवधि नहीं, बल्कि शासन की सकारात्मक उपलब्धियाँ ही किसी नेता के मूल्यांकन की वास्तविक कसौटी होनी चाहिए।







