Rajesh Thakur | Patna
आनंद मोहन सिंह। बिहार की सियासत से लेकर राजपूत महकमे तक में एक बार फिर चर्चा में हैं। उन्होंने महज 24 घंटे के अंदर तत्कालीन मुख्यमंत्री व जदयू के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार के खिलाफ दो कड़क व विवादित बयान देकर सियासी भूचाल ला दिया है। पहले बयान में आनंद मोहन ने कहा कि जदयू की चंडाल चौकरी ने नीतीश कुमार को जिंदा दफन कर दिया और दूसरे बयान में उन्होंने कहा कि निशांत कुमार को बिहार कैबिनेट में स्वास्थ्य मंत्री इसलिए बनाया गया है, ताकि दोनों बाप-बेटे (नीतीश कुमार व निशांत कुमार) का इलाज हो सके। बहस का मुद्दा इसलिए भी है कि जिनके खिलाफ आनंद मोहन ने यह विवादित बयान दिया है, वही नीतीश कुमार ने जेल नियमावली में संशोधन करके उन्हें जेल से बाहर निकाला था। आपको याद होगा 27 अप्रैल 2023 की वह तारीख, जब पूर्व सांसद आनंद मोहन सुबह-सुबह सहरसा जेल से रिहा हुए थे। पहले फांसी, फिर उम्रकैद की सजा काट रहे उनकी रिहाई के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने 10 अप्रैल को बिहार जेल नियमावली, 2012 में संशोधन किया था। बिहार सरकार के इस फैसले के बाद काफी विवाद भी खड़ा हुआ। तब विपक्ष ने आरोप लगाया था कि नीतीश कुमार की सरकार ने कानून में बदलाव केवल आनंद मोहन की मदद करने के लिए किया। आज वही आनंद मोहन अपने विवादित बयानों से नीतीश कुमार को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है। हालांकि, यह भी कहा जा रहा है कि उनके निशाने पर केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा हैं। इस बयान के बाद बिहार की सियासत में जो भूचाल आया है, वह थमने के नाम नहीं ले रहा है। सियासी पंडित इसे ‘ठाकुर का कुआँ’ वाले मुद्दा से जोड़ कर देख रहे हैं।


दरअसल, 90 के दशक में सवर्ण समाज, खासतौर पर राजपूत युवाओं के बीच आनंद मोहन का जबरदस्त क्रेज था। वे आज फिर उसी सामाजिक आधार को साधने की कोशिश करते दिख रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उस दौर की राजनीति और आज के बिहार की राजनीति में काफी बदलाव आ चुका है। यही कारण है कि सीतामढ़ी के मंच से पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर उनके तीखे हमले के बाद अब राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि कहीं आनंद मोहन ने एक बार फिर गलत समय पर ‘गलत पासा’ तो नहीं फेंक दिया। सीतामढ़ी के कार्यक्रम में आनंद मोहन ने जिस आक्रामक अंदाज में नीतीश कुमार पर हमला बोला, उसने बिहार की राजनीति का तापमान अचानक बढ़ा दिया। उन्होंने यहां तक कह दिया कि नीतीश कुमार को जिंदा दफन कर दिया गया, उनके बेटे निशांत को इसलिए स्वास्थ्य मंत्रालय दिया गया है, ताकि दोनों बाप-बेटे का इलाज हो सके और सम्राट चौधरी की कैबिनेट में ‘थैले के बल’ पर मंत्री बनाए गए हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ नाराजगी भरा बयान नहीं है, बल्कि इसके जरिए आनंद मोहन एक बार फिर खुद को राजपूत राजनीति के बड़े चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही शिवहर लोकसभा सीट हाथ से निकलते देख उन्होंने अपना सियासी आपा खो दिया। क्योंकि शिवहर विधानसभा सीट तो हाथ से इसी चुनाव में निकल चुकी, जब सीटिंग विधायक होते हुए भी आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद का वहां से टिकट काटकर नवीनगर भेज दिया गया। लेकिन उनके बयान के तुरंत बाद जिस तरह जदयू के बड़े नेताओं ने एक साथ मोर्चा खोल दिया, उसने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया है।
90 के दशक की राजनीति को करीब से देखने वाले लोग जानते हैं कि एक समय बिहार में आनंद मोहन का अलग ही प्रभाव था। मंडल राजनीति के उभार के दौर में जब सवर्ण समाज खुद को राजनीतिक रूप से असहज महसूस कर रहा था, तब आनंद मोहन एक आक्रामक और भावनात्मक शैली वाले नेता के रूप में उभरे। उनकी सभाओं में युवाओं की भारी भीड़ उमड़ती थी। कह सकते हैं कि लालू के शासन काल में रोबिनहुड वाला इमेज था। खासकर राजपूत समाज के युवाओं के बीच उनका जबरदस्त क्रेज था। 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में तो माहौल ऐसा था कि सवर्ण समाज का बड़ा तबका उन्हें अपने राजनीतिक सम्मान की आवाज मानने लगा था और उन्हें मुख्यमंत्री फेस के रूप में देखने लगा था। लेकिन राजनीति में कई बार सबसे बड़ी ताकत ही सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है। 1995 के चुनाव में तीन सीटों से चुनाव लड़ने का फैसला आनंद मोहन के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल माना गया। समर्थकों को भरोसा था कि वे बड़ी जीत दर्ज करेंगे, लेकिन अत्यधिक आत्मविश्वास का संदेश उल्टा पड़ गया। भारी चर्चा और माहौल के बावजूद वे तीनों सीटों से हार गये। राजनीतिक विश्लेषक आज भी मानते हैं कि वहीं से उनकी राजनीति की रफ्तार पहली बार कमजोर पड़ने लगी थी। वरना वो तो ओवर कॉन्फिडेंस में बिहार विधानसभा की ‘चाबी’ लेकर ही घूम रहे थे।

कहा जाता है न, जब इंसान की किस्मत खराब होती है तो वह चारों तरफ से घिरने लगता है। यही इनके साथ हुआ। मुजफ्फरपुर के तत्कालीन डीएम जी. कृष्णैया हत्याकांड मामले में सजा और लंबे जेल प्रवास ने उनकी सक्रिय राजनीति पर लगभग ब्रेक लगा दिया। इस दौरान बिहार की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी थी। नीतीश कुमार के नेतृत्व में जातीय उग्रता वाली राजनीति की जगह धीरे-धीरे गठबंधन, विकास, सामाजिक संतुलन और सत्ता प्रबंधन की राजनीति मजबूत हो चुकी थी। जब आनंद मोहन जेल से बाहर आए, तब बिहार पहले वाला बिहार नहीं था। यहां की सियासी आबो-हवा बदल चुकी थी। नीतीश कुमार की सत्ता पर मजबूत पकड़ हो गयी थी। जेल से बाहर आने के बाद आनंद मोहन को यह एहसास हुआ कि राजनीति अब सिर्फ उनके इर्द-गिर्द नहीं घूम रही है। उनके बेटे चेतन आनंद राजद से विधायक बन चुके थे। उनकी पत्नी लवली आनंद राजद के सहारे एक्टिव पॉलिटिक्स में आ गयी थीं। मतलब परिवार राजनीति में सक्रिय था, प्रभाव भी था, लेकिन केंद्र में आनंद मोहन खुद नहीं थे। सियासी पंडितों का मानना है कि यहीं से उनकी बेचैनी बढ़ने लगी। वे सिर्फ परिवार के संरक्षक नहीं, बल्कि खुद फिर से राजनीति के केंद्रीय चेहरे के रूप में स्थापित होना चाहते थे। इसी कोशिश में उन्होंने ‘ठाकुर का कुआँ’ वाला मुद्दा उठाया और तत्कालीन राजद सांसद मनोज झा से खुली टक्कर ली। उस समय इसे राजपूत अस्मिता की राजनीति को फिर से खड़ा करने की कोशिश माना गया। टीवी बहसों और सोशल मीडिया में यह मुद्दा खूब चला, लेकिन जमीन पर वैसा असर नहीं दिखा, जिसकी उम्मीद की जा रही थी।


‘ठाकुर का कुआँ’ वाला मुद्दा न केवल फिसड्डी साबित हुआ, बल्कि राजद से दूरी भी बना दी। इस तरह, चेतन आनंद और लवली आनंद जदयू में शामिल हो गये। हालांकि, जदयू ने शिवहर से चेतन आनंद का टिकट काट कर नवीनगर भेज दिया। जबकि, आनंद मोहन नवीनगर से अपने छोटे बेटे के लिए टिकट चाह रहे थे। नवीनगर से चेतन जीत तो गये, लेकिन जिस तरह महज 112 वोट से चुनाव जीते हैं, उस दर्द से आनंद मोहन अब तक उभर नहीं पाए हैं। वह दर्द अभी अंदर ही अंदर टीस ही रहा था कि शिवहर की विधायक श्वेता गुप्ता को सम्राट कैबिनेट में मंत्री बनाकर जदयू ने उनकी दुखती रग पर हाथ रख दिया। सियासी महकमे में यह भी चर्चा होने लगी कि 2029 के लोकसभा चुनाव में संभव है कि शिवहर लोकसभा क्षेत्र से लवली आनंद का टिकट कट सकता है। वहीं चेतन को मंत्री भी नहीं बनाया गया। ऐसे में आनंद मोहन का सब्र डोल गया। जातीय नेता से तो पहले ही हाशिये पर चले गये थे, अब कर्मभूमि शिवहर पर भी खतरा मंडराने लगा। सियासी पंडितों के अनुसार, आनंद मोहन को शायद यह उम्मीद थी कि उनके सामाजिक प्रभाव को देखते हुए उनके परिवार को सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी मिलेगी। लेकिन यहां तो सारा खेल ही उल्टा चल रहा था। इसे भांपते हुए आनंद मोहन ने बड़ी चाल चली। लेकिन वे यह भूल गये कि सम्राट चौधरी की कैबिनेट में दलित प्रतिनिधित्व के बाद सबसे अधिक राजपूत समाज को ही भागीदारी मिली है। इस समाज से चार मंत्री बनाए गये हैं, जिनमें लेसी सिंह, श्रेयसी सिंह, संजय सिंह टाइगर और संजय कुमार सिंह। इनमें सिर्फ लेसी सिंह जदयू कोटे से है और इनका नाम काटकर चेतन आनंद को मंत्री बनाना कहीं से भी संभव नहीं था। यही वजह है कि राजपूत उपेक्षा वाला नैरेटिव बहुत मजबूत जमीन नहीं पकड़ पा रहा है और ‘ठाकुर का कुआँ’ की तरह ‘नीतीश वाला पासा’ भी कारगर साबित होता नहीं दिख रहा है। वहीं उनका सवर्ण कार्ड भी काम नहीं आएगा, क्योंकि बिहार कैबिनेट का लगभग 25% मंत्री सवर्ण समाज से ही हैं। तभी तो आनंद मोहन ने नीतीश कुमार पर सियासी तलवार तानी तो उनके बचाव में लेसी सिंह, नीरज कुमार से लेकर संजय सिंह तक मैदान में कूद पड़े और आनंद मोहन को धो दिया।
बहरहाल, यह वही संजय सिंह हैं, जिन्होंने हर साल महाराणा प्रताप की जयंती पर आनंद मोहन की जेल से रिहा करने की मांग उठाते रहे थे और इसमें उन्हें कामयाबी भी मिली। नीतीश कुमार ने आनंद मोहन को जेल से बाहर लाने के लिए जेल मैन्युल तक में संशोधन करा दिया। तभी तो आनंद मोहन पर जदयू की ओर से सबसे अधिक सियासी प्रहार संजय सिंह ही कर रहे हैं। खास बात कि इसके दूसरे दिन ही संजय सिंह के आवास पर नीतीश कुमार पहुंच गये। सियासी पंडितों के अनुसार, संजय सिंह की पीठ थपथपाने के लिए ही नीतीश कुमार उनके आवास पर पहुंचे थे। राजनीति में समर्थन बदलना सामान्य बात है, लेकिन जब पुराने समर्थक ही सार्वजनिक रूप से दूरी बनाने लगे, तो उसे बदलते राजनीतिक समीकरणों का बड़ा संकेत माना जाता है। वैसे आनंद मोहन अब भी भीड़ जुटाने की क्षमता रखते हैं, लेकिन भीड़ और वोट में अंतर होता है। फिलहाल सियासी संकेत यही है कि जिस दांव से आनंद मोहन एक बार फिर खुद को राजपूत राजनीति के सबसे बड़े चेहरे के रूप में स्थापित करना चाहते हैं और इसी के जरिए शिवहर को अपनी मुट्ठी में करना चाहते हैं, दोनों ही स्तर पर वही दांव उनके लिए राजनीतिक असहजता की वजह बनता दिख रहा है। क्योंकि, इस बार न पूरा सामाजिक माहौल उनके साथ दिख रहा है, न सत्ता, न संगठन और न ही पुराने सहयोगी। ऐसे में बिहार की राजनीति अब यह सवाल पूछ रही है कि क्या आनंद मोहन अब भी 90 के दशक वाली राजनीति लड़ रहे हैं, जबकि बिहार की राजनीति बहुत आगे निकल चुकी है?







