Rajesh Thakur । Patna
बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ श्री कृष्ण सिंह यानी श्रीबाबू की पुण्यतिथि ऐसे समय पर आयी है, जब शिक्षा व्यवस्था को लेकर देश-भर में नयी नीतियों पर बहस तेज है। UGC से जुड़ी हालिया पहलों के बीच जातिगत तनाव और सामाजिक असहजता की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं, जिसने शिक्षा के मूल उद्देश्य को लेकर सवाल खड़े किए हैं। इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसके नये नियम पर फिलहाल रोक लगा दी है। इससे अब दूसरे खेमे में नाराजगी है। इसी पृष्ठभूमि में श्री बाबू की कर्मभूमि पर पिछले सप्ताह हुआ प्रतिमा अनावरण महज एक स्मृति-कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाले संदेश के रूप में देखा जा रहा है। प्रतिमा अनावरण यह भी याद दिलाता है कि विकास और शिक्षा का रास्ता टकराव से नहीं, संवाद और मिल्लत से होकर जाता है। दरअसल, श्री बाबू की आज 31 जनवरी को 65वीं पुण्यतिथि है। उनका निधन 1961 में हुआ था। निधन के वक्त हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए थे। आजादी के बाद वे 1952 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। 29 अप्रैल 1952 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी तथा इस पद पर 31 जनवरी 1961 तक बने रहे। 31 जनवरी को ही उन्होंने अंतिम सांस ली। लेकिन आमलोगों के मन में एक सवाल जरूर रहता है कि देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था और वे मुख्यमंत्री के पद पर 29 अप्रैल 1952 को आए तो बीच के समय में सत्ता की कुर्सी पर कौन थे…? तो इसका सीधा जवाब है कि श्रीबाबू ही थे, लेकिन उस समय बिहार में वह पद ‘प्रधानमंत्री’ कहलाता था। और इस पद पर श्रीबाबू 20 जुलाई 1937 को काबिज हुए थे और मुख्यमंत्री बनने के पहले 1952 तक रहे और संयोगवश वह तारीख भी 31 जनवरी ही थी। फिर पूरे देश के साथ ही बिहार भी आम चुनाव में उतरा। इसके बाद देश और बिहार सियासत की नयी इबारत लिखने में मशगूल हो गया तथा अभी तक लिख ही रहा है।

बरबीघा के रहने वाले थे श्रीबाबू : डॉ श्रीकृष्ण सिंह भले ही बरबीघा के रहने वाले थे, लेकिन उनकी कर्मभूमि हवेली खड़गपुर विधानसभा क्षेत्र थी। वहीं से उन्होंने बिहार का पहला विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने और फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे। वर्तमान में खड़गपुर विधानसभा क्षेत्र विलुप्त होकर तारापुर विधानसभा क्षेत्र में शामिल हो गया है। तारापुर के ही संग्रामपुर स्थित रामपुर नहर के निकट लगभग माह भर पूर्व श्रीबाबू की आदमकद प्रतिमा स्थापित की गयी। इस तरह आजादी के 78 साल बाद वे अपनी कर्मभूमि पर पहली बार अवतरित हुए। उनकी आदमकद प्रतिमा का अनावरण कोई और नहीं, बल्कि उसी विधानसभा क्षेत्र के प्रथम उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने किया। वैसे सम्राट चौधरी बिहार के आठवें उपमुख्यमंत्री हैं और इस कुर्सी पर लगातार दूसरी बार काबिज हुए हैं। ऐसे में श्रीबाबू की प्रतिमा का तारापुर विधानसभा क्षेत्र में स्थापित होना उनकी कर्मभूमि से भावनात्मक और ऐतिहासिक पुनर्संयोग के रूप में देखा जा रहा है।
हवेली खड़गपुर से बने थे विधायक : उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इसी माह 25 जनवरी को उनकी आदमकद प्रतिमा का अनावरण करते हुए कहा कि बिहार केसरी श्रीकृष्ण सिंह देश की आजादी की लड़ाई में एक महान स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में महात्मा गांधी के साथ मिलकर संघर्ष किया और आजादी के लिए काला पानी जैसी कठोर सजा भी झेली। ऐसे महान नेता की प्रतिमा का अनावरण करना उनके लिए गौरव का विषय है। उन्होंने यह भी कहा कि श्रीबाबू ने बिहार को विकास की नयी दिशा दी। उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। आजादी के बाद वे हवेली खड़गपुर से विधायक बने और जनसेवा को अपना उद्देश्य बनाया। उनके कार्यकाल में हनुमना डैम और खड़गपुर झील जैसे महत्वपूर्ण सिंचाई संसाधनों की स्थापना हुई, जो आज भी इस क्षेत्र की जीवन रेखा है। और अब इस क्षेत्र के विकास की जिम्मेदारी हमारी है। बता दें कि हाल ही उपमुख्यमंत्री ने खड़गपुर झील के विकास को लेकर ऑनस्पॉट स्टेट लेवल की बड़ी बैठक की। इसके पहले वे भीमबांध को विश्वस्तरीय बनाने की घोषणा कैबिनेट मीटिंग के माध्यम से कर चुके हैं और उन्होंने यह भी कहा है कि इस क्षेत्र को ‘टूरिज्म हब’ बनाया जाएगा।

सम्राट चौधरी ने दिया समाज को एक बड़ा मैसेज : पॉलिटिकल एक्सपर्ट की मानें तो श्रीबाबू की आदमकद प्रतिमा के बहाने उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी समाज को एक बड़ा मैसेज देने में सफल रहे कि वे भी हर समाज के लिए काम करना चाहते हैं। वे भी किसी जाति से बंधे हुए नहीं हैं। उन्होंने यह भी संदेश दिया कि वे अपने सामाजिक और वैचारिक पूर्वजों को सहेजने की परंपरा को आगे बढ़ाना चाहते हैं। दरअसल, डॉ. श्रीकृष्ण सिंह भूमिहार समाज से आते हैं और उनके बाद इस समाज से कोई अन्य नेता मुख्यमंत्री नहीं बना। लेकिन उनका व्यक्तित्व जातीय सीमाओं से कहीं ऊपर था। वे एक जाति के नहीं, बल्कि सभी समाज के नेता थे। उन्होंने ही जमींदारी उन्मूलन, कानून-व्यवस्था और सामाजिक समरसता जैसे मुद्दों पर सख्त और स्पष्ट नेतृत्व दिया। उनके कार्यकाल ने बिहार को प्रशासनिक स्थिरता और राजनीतिक दिशा प्रदान की, इसी कारण उन्हें बिहार केसरी की उपाधि मिली। यह भी जगजाहिर है कि उस समय सबसे अधिक जमींदारी भूमिहार समाज के पास ही थी। इसी समाज से तमाम जमींदार थे, लेकिन श्रीबाबू ने जाति नहीं देखी।
इतिहास एक बार फिर अपनी जड़ों से जुड़ा : बहरहाल, हवेली खड़गपुर मुख्यालय में अंग्रेज के जमाने में बना ‘ली हाईस्कूल’ (Lee High School) आजादी के बाद श्रीबाबू के नाम पर कर दिया गया था। उस विद्यालय का पूरा नाम राजेंद्र श्री कृष्ण विद्यालय है। बिहार के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह, दोनों के नामों को एक साथ संजो कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी। इसके अलावा मुंगेर जिला मुख्यालय में उनके नाम पर श्रीकृष्ण सेवा सदन पहले से स्थापित है। लेकिन उनकी कर्मभूमि में अब तक कोई प्रतिमा नहीं थी। ऐसे में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह का आजादी के 78 साल बाद अपनी कर्मभूमि में यह प्रतीकात्मक अवतरण स्थानीय लोगों को भावुक कर रहा है। लोगों में इसे लेकर खासा उत्साह है, मानो इतिहास एक बार फिर अपनी जड़ों से जुड़ गया हो। ऐसे में लोगों को टकराव से बचने की जरूरत है। उनके बताये मार्ग पर चलने की जरूरत है।








