15 फरवरी 1932 को जब तारापुर बन गया था ‘जलियांवाला बाग’, सम्राट चौधरी ने दी श्रद्धांजलि

Rajesh Thakur | Tarapur
मुंगेर जिला का छोटा-सा कस्बा तारापुर। 15 फरवरी 1932 को इस धरती की सुबह सामान्य नहीं थी। यह वह दिन था, जब आजादी का सपना केवल नारों में नहीं, बल्कि सीने पर गोलियां झेलते हुए सच किया जा रहा था। ब्रिटिश शासन के खिलाफ उफनते जनाक्रोश ने उस दिन भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अमिट अध्याय जोड़ दिया, जिसे आज हमलोग तारापुर गोलीकांड के नाम से जानते हैं। दरअसल, 1932 का वह साल था, जब देशभर में सविनय अवज्ञा आंदोलन की गूंज थी। गांधी-इरविन समझौते के बाद भी दमन की नीतियां जारी थीं। इसके खिलाफ बिहार के ग्रामीण इलाकों में भी स्वतंत्रता की चेतना तेजी से फैल रही थी। तारापुर भी इससे अछूता नहीं था। यहां के युवाओं ने निर्णय लिया कि वे ब्रिटिश सत्ता के प्रतीक तारापुर थाना भवन पर तिरंगा फहराकर अंग्रेजी सरकार को खुली चुनौती देंगे। और वे इसमें सफल भी रहे। थाने के भवन से ब्रिटिश यूनियन जैक को उतारकर युवाओं ने भारतीय झंडा फहराया। इसमें क्रांतिकारी मदन गोपाल सिंह को सफलता मिली।

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34 देशभक्त हुए थे शहीद : वह नजारा भी काफी खास ही था, जब 15 फरवरी की सुबह हजारों की भीड़ ‘वंदे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ के नारों के साथ थाने की ओर बढ़ी थी। उनके हाथों में लाठी या हथियार नहीं, बल्कि तिरंगा और आजादी का विश्वास था। लेकिन जैसे ही जुलूस थाना परिसर के समीप पहुंचा, अंग्रेजी पुलिस ने पहले लाठीचार्ज किया और फिर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। आधिकारिक और स्थानीय अभिलेखों के अनुसार, उस दिन करीब 34 देशभक्त शहीद हुए थे। कहा जाता है कि दो दर्जन से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों की तो मौके पर ही मौत हो गयी थी, जबकि कई घायल बाद में काल-कवलित हो गये। कहा जाता है कि पुलिस ने दर्जनों राउंड गोलियां चलायीं। यह घटना आकार और प्रभाव की दृष्टि से ब्रिटिश काल के बड़े गोलीकांडों में गिनी जाती है, जिसकी तुलना जलियांवाला बाग की त्रासदी के बाद के प्रमुख दमनात्मक घटनाक्रमों से की जाती है। हालांकि, इसमें तत्कालीन कलेक्टर ईओ ली घायल हुए थे।

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क्यों था तारापुर इतना अहम : विडंबना यह है कि सभी शहीदों के नाम इतिहास में सुरक्षित नहीं रह सके। महज 13 शहीदों की ही पहचान हो सकी थी, लेकिन 21 अमर सपूत गुमनाम ही इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। तारापुर की मिट्टी आज भी उन अनाम वीरों की कहानी कहती है। उस समय तारापुर कोई बड़ा महानगर नहीं था, लेकिन उस दिन यह राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बन गया। थाना पर तिरंगा फहराना केवल एक प्रतीकात्मक कदम नहीं था; यह अंग्रेजी शासन को यह संदेश था कि अब जनता भय से मुक्त हो रही है। यह ग्रामीण भारत के राजनीतिक जागरण का प्रमाण था कि आजादी की लड़ाई केवल शहरों तक सीमित नहीं रही। इतिहास से जुड़े लोग मानते रहे हैं कि इस घटना ने बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन को नयी ऊर्जा दी। गांव-गांव में यह संदेश गया कि यदि तारापुर के नौजवान गोलियों के सामने डट सकते हैं, तो पूरा प्रदेश भी अन्याय के विरुद्ध खड़ा हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान 31 जनवरी, 2021 को ‘मन की बात’ कार्यक्रम में इस घटना का जिक्र कर इसे विश्व पटल पर ला दिया। फिर 15 फरवरी, 2022 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शहीद की प्रतिमाओं का अनावरण किया। साथ ही तारापुर शहीद दिवस को राजकीय समारोह के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया।

तारापुर में शहीद स्मारक पर उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने किया माल्यार्पण।

उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने दी श्रद्धांजलि : आज 15 फरवरी 2026 को एक बार फिर तारापुर के शहीदों को याद किया। राजकीय समारोह के इस आयोजन में उपमुख्यमंत्री सह गृहमंत्री सम्राट चौधरी शामिल हुए। उन्होंने शहीद स्मारक पहुंचकर मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले 34 अमर शहीदों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान राष्ट्रीय ध्वज फहराकर उन्होंने बलिदानियों को नमन किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि आजादी की लड़ाई में दूसरा सबसे बड़ा गोलीकांड मुंगेर के तारापुर थाना पर तिरंगा फहराते हुए हुआ था। तारापुर की धरती पर वीरों का रक्त केवल इतिहास नहीं, राष्ट्र भक्ति की चेतना है। मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए ‘वंदे मातरम्’ के उद्घोष के साथ वीर सपूतों का बलिदान अदम्य साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति सदैव हमारी प्रेरणा और गौरव का स्रोत है। इस मौके पर तारापुर के पूर्व विधायक राजीव कुमार सिंह, जमुई लोकसभा क्षेत्र प्रभारी व पूर्व जिला पार्षद अध्यक्ष रविंद्र सिंह कल्लू सहित अन्य लोग शामिल थे।