Mukhiyajee Special | West Bengal Election 2026 : पश्चिम बंगाल की 50 सीटों पर बिहार फैक्टर का जलवा

Chandra Shekhar Azad | Kolkata

पश्चिम बंगाल में चुनावी अखाड़ा सज चुका है। 294 विधानसभा सीटों पर होने जा रहे चुनाव के लिए सत्ताधारी All India Trinamool Congress (TMC) सहित विपक्ष में Bharatiya Janata Party (BJP), Communist Party of India (CPI), Communist Party of India (Marxist) (CPM) और Indian National Congress समेत अन्य दल पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर चुके हैं। चुनावी मुद्दों में विपक्ष रोजगार संकट, शहरी अव्यवस्था, जलजमाव, खराब सड़कें, ट्रैफिक दबाव, महंगाई, कानून-व्यवस्था आदि को प्रमुख रूप से उठा रहे हैं। वहीं सत्ता पक्ष ममता सरकार की उपलब्धियां गिना रहा है। दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को मतदान है तो 4 मई को मतगणना होगी। मुखियाजी ई-पेपर और मुखियाजी न्यूज पोर्टल भी इस चुनावी मैदान में उतर रहा है। लेकिन चुनाव लड़ने के लिए नहीं, बल्कि उसे जमीनी हकीकत के साथ पाठकों तक पहुंचाने के लिए। इसी कड़ी में चुनावी सीरीज का आगाज करते हैं पश्चिम बंगाल चुनाव में बिहार फैक्टर से।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में इस बार सियासत का असली खेल ‘बिहार फैक्टर’ का रहेगा, इससे कतई इनकार नहीं किया जा सकता है। राज्य की कुल 294 में से करीब 50-60 सीटों पर बिहार मूल के हिंदीभाषी मतदाताओं का सीधा असर है। इसमें भी 10 से 15 सीटें ऐसी हैं, जहां यह वोट बैंक सीधे अपने फेवर के विधायक चुन सकता है। चुनाव मैदान में उतर चुकी तमाम राजनीतिक पार्टियां अब इस सच्चाई को समझ चुकी हैं। यही वजह है कि उम्मीदवार चयन से लेकर प्रचार तक, हर रणनीति में बिहार से जुड़े वोटरों को साधने की कोशिश साफ नजर आ रही है। दरअसल, पश्चिम बंगाल विस चुनाव 2026 की सियासत इस बार एक नए मोड़ पर खड़ी है। दशकों से क्षेत्रीय मुद्दों और पहचान की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमने वाला यह चुनाव अब एक ऐसे सामाजिक समीकरण से प्रभावित होता दिख रहा है, जिसे राजनीतिक गलियारों में ‘बिहार फैक्टर’ के नाम से जाना जा रहा है।

पश्चिम बंगाल चुनाव में ‘बिहार फैक्टर’ कोई अचानक उभरी घटना नहीं है। जूट मिलों, रेलवे, कोयला खदानों और इस्पात उद्योग के विस्तार के दौर में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में श्रमिक यहां आकर बसे। समय के साथ यह आबादी केवल मजदूर वर्ग तक सीमित नहीं रही, बल्कि व्यापार, परिवहन और छोटे उद्योगों में भी मजबूत पकड़ बना चुकी है। आज हावड़ा, आसनसोल, दुर्गापुर, खड़गपुर सहित उत्तर बंगाल के कई हिस्सों में हिंदीभाषी मतदाता 25 से 40 प्रतिशत तक प्रभाव रखते हैं। यह वही वर्ग है, जो अब चुनावी रणनीति का केंद्र बनता जा रहा है। सियासी पंडितों की मानें यदि हिंदीभाषी वोट एकजुट हुआ, तो कई सीटों पर परिणाम उलट सकते हैं। वहीं यह वोट बैंक बंटा, तो स्थानीय और पारंपरिक समीकरण हावी रहेंगे। शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में इसका असर सबसे ज्यादा देखने को मिलेगा।

बहरहाल, सत्ता की राह अब नए समीकरण से होकर पश्चिम बंगाल का यह चुनाव अब केवल क्षेत्रीय दलों की लड़ाई नहीं रह गया है। यह एक ऐसा चुनाव बनता जा रहा है, जहां माइग्रेशन, भाषा, रोजगार और पहचान जैसे कई कारक मिलकर नतीजे तय करेंगे। यही वह गणित है, जिसके सहारे इस बार बंगाल की सत्ता का रास्ता तय होगा। इससे यह साफ है कि ममता सरकार या विपक्ष में मुस्तैदी से चुनाव लड़ रही बीजेपी के लिए 2026 में ‘बिहार फैक्टर’ को नजरअंदाज करना राजनीतिक जोखिम से कम नहीं होगा। इसे हाशिये पर जा रहे वाम दल भी समझने लगे हैं।