NDA में ‘हिडेन नेता’ नैरेटिव सेट कर घेर रहे सम्राट चौधरी को, नीतीश क्या चाहते हैं; 5 पॉइंट्स में सबकुछ समझिए

Rajesh Thakur | Patna

बिहार में सीएम फेस को लेकर सियासी हलचल काफी तेज है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने निर्धारित समय पर 30 मार्च को विधान पार्षद के पद से इस्तीफा दे दिया। उसी दिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी विधायक पद से त्यागपत्र दे दिया। बस अब नीतीश कुमार के CM पद से इस्तीफे का इंतजार किया जा रहा है। यह भी तय माना जा रहा है कि इस बार भाजपा फ्रंट लाइन पर रहेगी। उसका अपना मुख्यमंत्री होगा। वहीं सेकंड लाइन में जदयू सहित अन्य पार्टियां हैं। दरअसल, तेज होती सियासी हलचल के बीच भारतीय जनता पार्टी के भीतर एक समानांतर संघर्ष और तेज हो गया है। यह है नैरेटिव का संघर्ष। इस लड़ाई के केंद्र में हैं सम्राट चौधरी। वे भाजपा में मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं और फिलहाल उपमुख्यमंत्री सह गृहमंत्री के पद पर काबिज हैं। चूंकि बिहार विधानसभा चुनाव के समय ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने असरगंज की चुनावी सभा में काफी जोरदार ढंग से पीठ थपथपायी थी, वहीं संग्रामपुर की सभा में केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा था कि ‘सम्राट के तो नाम में ही सम्राट लिखा हुआ है और उनका कद और व्यक्तित्व भी विराट है।’ लेकिन जब से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़ने की बात हुई है और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार बताये जा रहे हैं, तब से NDA के ‘हिडेन नेता’ उन्हें घेरने में लग गये हैं। उनके खिलाफ तरह-तरह के ‘सियासी चाल’ चल रहे हैं। उनके खिलाफ ‘नैरेटिव वॉर’ चलाये जा रहे हैं।

नैरेटिव का कोई एक लेयर नहीं है : सियासी पंडितों और राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बिहार से लेकर दिल्ली तक ‘हिडेन नेताओं’ का एक ऐसा लेयर एक्टिव है, जो सामने आए बिना यानी परदे के पीछे से ‘रणनीति’ तय कर रहा है। यह ग्रुप खुलकर विरोध नहीं कर रहा है, बल्कि एक नैरेटिव के जरिए माहौल प्रभावित करने में जुटा है यानी सीधी लड़ाई नहीं, बल्कि बिना चेहरा दिखाए ‘सोच’ पर कब्जा करने की कोशिश की जा रही है। खास बात कि नैरेटिव की कोई एक लेयर नहीं है, बल्कि कई लेवल पर इसे सामने लाया जा रहा है। इसके पीछे वैसे तत्वों की सिर्फ और सिर्फ ‘एक ही मंशा’ है कि भाजपा से कोई भी CM बन जाए, लेकिन सम्राट चौधरी CM नहीं बने। उनके खिलाफ चल रही यह मुहिम एकरेखीय नहीं, बल्कि बहुस्तरीय है। कहीं यह संदेश प्लांट किया जा रहा है कि वे दूसरे वरिष्ठ नेताओं के साथ संतुलन नहीं बना पा रहे हैं। कहीं जातीय अस्मिता का प्रश्न खड़ा कर उनके खिलाफ भावनात्मक जमीन तैयार की जा रही है तो कहीं अचानक नए नामों को उछालकर यह माहौल बनाया जा रहा है कि ‘पार्टी के पास बेहतर विकल्प मौजूद हैं’। इस पूरे ‘खेल’ की खासियत यह है कि कोई एक चेहरा सामने नहीं आता, लेकिन अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर एक ही तरह की बातें लगातार दोहरायी जाती हैं, ताकि नैरेटिव ‘नेचुरल’ लगे।

‘ऑफ द रिकॉर्ड’ से ‘पब्लिक डिस्कोर्स’ तक : सियासी पंडितों का मानना है कि यह रणनीति बेहद योजनाबद्ध होती है। पहले ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ चर्चाओं में बातें डाली जाती हैं, फिर वही संकेत सोशल मीडिया और मीडिया डिबेट में उभरने लगते हैं, और धीरे-धीरे वह पब्लिक डिस्कोर्स का हिस्सा बन जाती हैं। सम्राट चौधरी के मामले में भी यही पैटर्न साफ नजर आ रहा है, जहां सवालों की शुरुआत अंदरखाने से होती है और फिर वही सवाल सार्वजनिक बहस का रूप ले लेते हैं। इस नैरेटिव वॉर की सबसे अहम बात यह है कि इसका केंद्र बिंदु का भी वे लोग पता नहीं लगने देते हैं। लेकिन यह भी सच है कि पटना से लेकर दिल्ली तक इसके ‘जाल’ फैले हुए हैं। हालांकि, सार्वजनिक मंचों पर एकजुटता का संदेश दिया जा रहा है। बहरहाल, राजनीतिक इतिहास बताता है कि जब किसी एक चेहरे के खिलाफ इतने संगठित तरीके से ‘नैरेटिव गढ़ा’ जाता है, तो वह चेहरा पहले से कहीं ज्यादा केंद्र में आ जाता है। सम्राट चौधरी के मामले में भी यही होता दिख रहा है। विरोध की यह परतें जहां एक ओर उनकी राह मुश्किल बना रही हैं, वहीं दूसरी ओर यह भी संकेत दे रही हैं कि वे अब सिर्फ एक दावेदार नहीं, बल्कि सत्ता की दौड़ में सबसे आगे खड़े नेता बन चुके हैं। अब फैसला भाजपा नेतृत्व को करना है कि नैरेटिव की आवाज सुनी जाए या जमीन की; क्योंकि बिहार की अगली सियासी दिशा इसी चयन से तय होगी। हालांकि, नैरेटिव गढ़ने वाली की परतें भी धीरे-धीरे खुलती जा रही हैं।

कैसे-कैसे नैरेटिव, समझिए इन 5 पॉइंट्स में

  1. जाति, भावना और भ्रम का खेल : बिहार में कास्ट पॉलिटिक्स का अपना महत्व है। इसके बिना राजनीति अधूरी है। सोशल मीडिया पर सम्राट चौधरी के नाम पर विरोधी ‘कास्ट पॉलिटिक्स का पत्ता’ चल रहे हैं। यदि आप सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं तो भूमिहार के नाम पर कुछ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा के नाम पर अपनी चाल चल रहे हैं। पिछले दिनों ही इसी टाइप के फेसबुक पेज पर लिखा गया था- ‘क्या बिहार को मिल सकता है कोई भूमिहार सीएम? कमेंट करें कौन बनेगा अगला मुख्यमंत्री बिहार के। जय बिहार, जय भूमिहार…।’ इसके पहले इसी पेज पर यह भी पोस्ट था- ‘आज बिहार दिवस है, आधुनिक बिहार के निर्माण का श्रेय प्रथम मुख्यमंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह को जाता है अगर फिर से नव निर्माण करना है तो विजय कुमार सिन्हा जी और राकेश सिन्हा जी जैसे ईमानदार और विकासशील विचारवान लोगों को मुख्यमंत्री बनाना होगा। अन्यथा वही जाति का ढोंग, जाति का खेल लूटपाट अपराध रहेगा।’ यह तो महज उदाहरण मात्र है। इससे उनके नैरेटिव को समझा जा सकता है। लेकिन जब पब्लिक से लेकर नेता तक समझने लगे तो उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा का मीडिया में बयान आ गया है कि वे मुख्यमंत्री की रेस में नहीं हैं। बाकी पिछले दिनों मोकामा विधायक अनंत सिंह ने बीजेपी में सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बताकर विरोधियों की नैरेटिव वाली ‘बोलती’ बंद कर दी।
  2. दलित राजनीति को हवा देने की कोशिश : अब बात करते हैं दलित राजनीति वाले नैरेटिव की। बिहार के सियासी गलियारे में कुछ यू-ट्यूब पर अचानक चलने लगा कि भाजपा किसी दलित फेस को अपना मुख्यमंत्री चेहरा बनाना चाहती है। न इसमें किसी नेता का बयान था और न ही किसी नेता का ठोस संकेत। लेकिन, जब न्यूज चल पड़ी तो दनादन नए-नए नाम भी आने लगे। दैनिक भास्कर ग्रुप के डिजिटल प्लेटफॉर्म ने खबर छापा- ‘सूत्रों के मुताबिक, 25 मार्च को दिल्ली में भाजपा और RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के टॉप लीडरों के बीच बैठक हुई। इसमें RSS ने अपनी पहली पसंद खाटी भाजपाई और दलित चेहरा बताया है। दूसरी पसंद EBC (अति पिछड़ा वर्ग) चेहरा है। एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में जानिए, बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन हो सकता है। सम्राट चौधरी और फॉरवर्ड नेताओं का क्या होगा…?’ हालांकि, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने पहले ही कह दिया था कि वे इस दौर में नहीं हैं, साथ ही उन्होंने स्पष्ट रूप से यह भी कहा कि मुख्यमंत्री का निर्णय एनडीए नेतृत्व करेगा और सम्राट चौधरी एक सक्षम नेता हैं। जबकि केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी गया के एक कार्यक्रम में सम्राट चौधरी के पक्ष में बयान देकर इस नैरेटिव की हवा निकाल दी।
  3. ओबीसी बनाम अन्य की बहस को क्रिएट करना : नैरेटिव गढ़ने वाले यहीं पर चुप नहीं बैठे हैं। प्लांट स्टोरी बनवायी गयी, जिसमें OBC वर्सेज अन्य का नया खटराग छेड़ा गया, जिसका न कोई सुर नजर आ रहा था और न ही ताल का कोई तारतम्य था। इसके तहत कई नामों को उछाला गया। हर नाम वाले व्यक्ति की विशेषता बतायी गयी। साथ ही उनकी तुलना में सम्राट चौधरी की खामियाँ जबरदस्ती गिनायी गयीं। सोशल मीडिया के भी कई प्लेटफॉर्म पर इसकी हवा फैलायी गयी। लेकिन यह भी दमगर नहीं निकला। इसके अलावा महिला मुख्यमंत्री की भी नैरेटिव सेट किया जा रहा है। इसमें श्रेयसी सिंह से लेकर मैथिली ठाकुर तक के नामों को उछाला जा रहा है। इसी तरह कोई सवर्ण के नाम पर राजपूत-ब्राह्मण उम्मीदवार की राजनीति करा रहा है। मतलब साफ है कि नैरेटिव गढ़ने वाले सम्राट चौधरी के खिलाफ कोई भी विकल्प छोड़ना नहीं चाहते हैं। हालांकि, रामनवमी के मौके पर आनंद मोहन ने यह कहकर विरोधियों की हवा निकाल दी कि ‘लव-कुश समीकरण’ को साधने के लिए सम्राट चौधरी एक उपयुक्त चेहरा हो सकते हैं।
  4. निशांत को संभावित चेहरा बताकर भ्रम फैलाना : बिहार की सियासत में अभी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार छाए हुए हैं। जदयू कोटे से कई मंत्री लगातार निशांत कुमार का नाम सीएम पद के लिए उछाल रहे हैं। इतना ही नहीं, अब तो वे नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी व विजय सिन्हा के सामने ही नारे लगा रहे हैं कि बिहार का सीएम कैसा हो, निशांत कुमार जैसा हो… वैसे लोगों को यह समझना चाहिए कि जब जदयू से ही मुख्यमंत्री बनना था तो नीतीश कुमार को ‘कुर्सी’ छोड़ने की क्या जरूरत थी। सियासी पंडित भी इसे मानते हैं। लेकिन उन ‘हिडेन नेताओं’ को कौन समझाये। कुछ यू-ट्यूब को देख लेंगे तो माथा पीट लेंगे। प्रश्नवाचक चिह्न लगाकर वे सीधे लिख देते हैं- ‘नीतीश ने बदला फैसला, निशांत को बनाएंगे CM…’ उसी के नीचे लिखेंगे- BJP का नहीं, JDU का होगा मुख्यमंत्री, नीतीश की मुस्कान ने सब किया क्लियर, बड़ा खेल होगा…’ आप इसे नीचे दिये गये तस्वीर में भी देख सकते हैं। भले ही इसका असर पढ़े-लिखे व्यूर्स (पाठकों) पर नहीं पड़े, लेकिन कम-पढ़े लिखे लोगों पर तो पड़ ही जाता है। इससे वैसे व्यूर्स में कन्फ्यूजन तो हो ही जाता है और इसी कन्फ्यूजन पर बड़ी-बड़ी बहस भी हो जाती है।
  5. सर्वे के नाम पर योजनाबद्ध तरीके से मीडिया ट्रायल चलाना : हिडेन नेता यूट्यूब मीडिया को तो आसानी से ‘टूल’ बना रहे हैं। इसी का एक पार्ट ‘सर्वे’ भी है। कोई ‘सम्राट चौधरी vs निशांत कुमार’ का सर्वे चला रहा है तो कोई ‘OBC vs दलित मुख्यमंत्री’ चला रहा है। कोई ‘महिला मुख्यमंत्री’ के नाम पर जनता से ‘समर्थन’ मांग रहा है। बिना सिर-पैर’ के सवाल भी पूछे जाते हैं, जिसका सच्चाई से कोई वास्ता नहीं रहता है, लेकिन ‘कन्फ्यूजन’ चाय-पान दुकान पर बेशक बहस का मुद्दा बन ही जाता है। कुछ ऐसी ही स्थिति ‘सट्टा बाजार’ की भी होती है। कभी योजनाबद्ध तरीके से ऐसी खबरें प्लांट करवायी जाती हैं, जिनमें अन्य नामों को ‘योग्य’ और सम्राट चौधरी को ‘कमतर’ दिखाया जाता है। सियासी पंडितों की मानें तो जिस नेता को टार्गेट किया जाता है, उसके खिलाफ हर एंगल का प्रयोग किया जाता है और सम्राट चौधरी को लेकर भी ‘हिडेन नेता’ ऐसा ही कुछ कर रहे हैं। यह केवल व्यक्तिगत विरोध नहीं, बल्कि सत्ता के संभावित समीकरणों को प्रभावित करने की कोशिश भी है।

बहरहाल, दिलचस्प यह है कि जिस आक्रामक तरीके से नैरेटिव गढ़ा जा रहा है, उसी अनुपात में यह भी साफ हो रहा है कि सम्राट चौधरी को लेकर अंदरखाने एक ‘स्वाभाविक स्वीकार्यता’ बन चुकी है। सियासी पंडितों का कहना है कि जब विरोध इतना संगठित और बहुआयामी हो, तो यह संकेत भी होता है कि संबंधित नेता वास्तव में मजबूत स्थिति में है। सवाल भी वही करते हैं और जवाब भी वही देते हैं। सवाल करते हैं कि सम्राट क्यों बन रहे हैं केंद्र बिंदु? जवाब में इसकी तीन बड़े कारण बताते हैं— पहला, सम्राट चौधरी के ओबीसी वर्ग से आने के कारण उनका व्यापक सामाजिक प्रभाव है। दूसरा, संगठन में उनकी मजबूत पकड़ और कार्यकर्ता स्तर तक सीधी पहुंच है। और तीसरा, सम्राट चौधरी की आक्रामक राजनीतिक शैली, जो उन्हें भीड़ से अलग करती है। यही वजह है कि जैसे-जैसे उनकी दावेदारी मजबूत होती जा रही है, वैसे-वैसे उनके खिलाफ नैरेटिव भी आक्रामक होता जा रहा है। लेकिन, इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और दिलचस्प नजारा देखने को मिल रहा है। जहां नीतीश कुमार लगातार सम्राट चौधरी की पीठ थपथपा रहे हैं, वहीं पार्टी के आलाकमान बंगाल चुनाव को लेकर उनका कद बढ़ा रहे हैं। और इसे सियासी पंडित सम्राट चौधरी के पक्ष में ‘साइलेंट कंसेंसस’ जैसा माहौल मानते हैं, जो किसी भी नैरेटिव से ज्यादा प्रभावी होता है। वे यह भी मानते हैं कि जब किसी एक चेहरे के खिलाफ इतने संगठित तरीके से नैरेटिव गढ़ा जाता है, तो वह चेहरा पहले से कहीं ज्यादा केंद्र में आ जाता है। सम्राट चौधरी के मामले में भी यही होता दिख रहा है। आज वह सत्ता की दौड़ में सबसे आगे खड़े नेता बन चुके हैं। अब फैसला भाजपा नेतृत्व को करना है। बिहार की अगली सियासी दिशा इसी चयन से तय होगी।