लोकतंत्र, असहमति और NSA : सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) प्रकरण के बहाने

लोकतंत्र में कानून की शक्ति जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है उसका विवेकपूर्ण इस्तेमाल। हाल में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक से जुड़े घटनाक्रम ने इसी सवाल को फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है—क्या असहमति को सुरक्षा के खतरे के रूप में देखा जाना चाहिए, और क्या किसी नागरिक को बिना स्पष्ट अपराध सिद्ध हुए लंबे समय तक हिरासत में रखना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है? प्रस्तुत लेख में शिक्षाविद अमरनाथ इसी संदर्भ में न्याय, सत्ता और नागरिक अधिकारों के जटिल रिश्ते की पड़ताल करते हैं। यह लेख केवल एक व्यक्ति के मामले की चर्चा नहीं करता, बल्कि उस व्यापक प्रश्न को उठाता है कि लोकतंत्र में कानून का उद्देश्य भय पैदा करना है या नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करना…।

हाल की घटना ने एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र में न्याय, सत्ता और नागरिक अधिकारों के रिश्ते पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कल तक सरकार /गृह मंत्रालय लगातार कह रहे थे कि सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) को छोड़ना खतरनाक है, इसलिए 26 सितंबर 2025 से उसे जेल में बंद रखे थे। लेकिन जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि वह सोनम वांगचुक के उस भाषण को सुनना चाहता है, जिसके आधार पर उन्हें जेल भेजा गया था, अचानक स्थिति बदल गयी। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की तारीख 17 मार्च 2026 थी, लेकिन इससे पहले ही सरकार ने उन्हें तत्काल प्रभाव से 14 मार्च 2026 को जेल से बाहर निकालने का आदेश दे दिया। यह घटना अपने आप में कई प्रश्नों को जन्म देती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि कोई व्यक्ति सच में इतना बड़ा अपराधी था, जिस पर NSA लग सकता था और जिसे सोशल मीडिया में देशद्रोही तक कहने वालों की कमी नहीं थी/है, तो उसे गृह मंत्रालय द्वारा अचानक रिहा कैसे किया जा सकता है? और यदि वह निर्दोष है तो उसे जेल में डाला ही क्यों गया? यह विरोधाभास सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की ओर इशारा करता है, जिसमें आरोप पहले लग जाते हैं और न्याय बाद में खोजा जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी नागरिक को केवल आरोप के आधार पर अपराधी नहीं माना जा सकता। अपराध सिद्ध करना अदालत का काम है, न कि प्रशासन या सत्ता का।

NSA धारा का इस तरह से प्रयोग मुझे औपनिवेशिक शासन की याद दिलाती है। अंग्रेजों ने इसी तरह के कानून रोंलेट एक्ट (Rowlatt Act), 1919 का इस्तेमाल स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए और नेताओं को जेल भेजने के लिए लाया था। जिसका विरोध उस समय हमारे नेताओं द्वारा जोर-शोर से किया गया था और जिसका परिणाम जालियांवाला बाग कांड, यह आज भी रूह को हिला देता है। लेकिन आजादी के बाद भी ऐसा कानून, जिसमें बिना किसी ठोस कारण के किसी को साल भर तक जेल में बंद किया जा सकता है, कहां तक तर्कसंगत है। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में न्यायपालिका ही वह संस्था है, जो अपनी सीमाओं के बाबजूद अब भी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कर पा रही है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति को पहले जेल भेज दिया जाए और महीनों तक जेल में बंद रखने के बाद उसे छोड़ दिया जाए, चाहे अदालत के हस्तक्षेप के बाद या सरकार की मर्जी से ही, तो यह प्रक्रिया ही न्याय के मूल सिद्धांतों पर प्रश्नचिह्न लगा देती है।

दरअसल, लोकतंत्र में असहमति देशद्रोह नहीं होती। विचार, भाषण और विरोध की स्वतंत्रता ही लोकतंत्र की आत्मा है। यदि हर असहमति को राष्ट्रविरोधी या देश के माहौल खराब करने वाला करार दिया जाने लगे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल औपचारिक ढांचा बनकर रह जाएगा। क्योंकि सिर्फ वोट दे देना लोकतंत्र नहीं होता वोट देना जरूर महत्वपूर्ण है, लेकिन यह सिर्फ एक औपचारिक शुरुआत है। लोकतंत्र पूरा बनता है लोगों के जिंदा लगाव, बहस, विरोध और संवाद से, जो सत्ता को जवाबदेह और समाज को न्यायपूर्ण बनाता है। इसलिए यह जरूरी है कि NSA जैसे गंभीर आरोपों का इस्तेमाल बेहद सावधानी और जिम्मेदारी के साथ किया जाए। अन्यथा ऐसी घटनाएं यह संदेश देती हैं कि कानून कभी-कभी न्याय के लिए नहीं, बल्कि बहुमत की तानाशाही के‌ लिए हो जाता है। जबकि, कानून का काम अल्पमत का संरक्षण करना होता है, बहुमत तो सत्ता की शक्ति का इस्तेमाल अपने हित के लिए कर रहा होता है। ऐसे में सवाल वही रह जाता है- यदि कोई सचमुच NSA के लायक है, तो फिर गृह मंत्रालय उसे कैसे छोड़ सकता है ? और यदि वह निर्दोष है, तो उसे जेल में डालने की जरूरत ही क्या थी? यही प्रश्न उस वक्त भी हमारे लोकतंत्र के सामने खड़ा था, जब सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) को जेल भेजा गया था और आज भी उसी रूप में खड़ा है, जब आज उन्हें गृह मंत्रालय द्वारा जारी आदेश के कारण छोड़ा जा रहा है…।

(नोट : लेखक अमरनाथ बिहार के जाने-माने शिक्षाविद हैं। वे पटना स्थित अपने शैक्षणिक संस्थान के माध्यम से ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों रूपों में विद्यार्थियों को मार्गदर्शन देते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय रहने के साथ-साथ वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर नियमित लेखन करते हैं। कविता और व्यंग्य लेखन में भी उनकी विशेष रुचि है। उनकी रचनाएँ विभिन्न साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित हो चुकी हैं। वे मुखियाजी डॉट कॉम और मुखियाजी ई-पेपर के लिए नियमित लिखते हैं। इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)

लेखक अमरनाथ।