हवेली खड़गपुर में भागवत कथा : कालियानाग वध से रुक्मिणी विवाह तक भाव-विभोर हुए श्रद्धालु

Mukhiyajee Reporter | Haveli Kharagpur

Mukhiyajee Devotional News | मुंगेर जिले का हवेली खड़गपुर प्रखंड मुख्यालय श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह समारोह से भक्तिमय हो गया है। यह आयोजन सिंहपुर स्थित नाथ स्थान में 2 अप्रैल से चल रहा है। यहां का माहौल पूरी तरह उत्सवी रंग में रंग गया है। खास बात कि पूरे शहर में लाउडस्पीकर लगा दिये जाने से वैसे लोगों को कथा सुनने में काफी फायदा हो रहा है, जो अपरिहार्य कारणों से आयोजन स्थल तक नहीं जा पाते हैं। इससे वैसे दुकानदारों को भी फायदा है, जो शाम में बिजनेस की वजह से वहां नहीं जा पाते हैं। ऐसे लोग घर और दुकान से ही कथा का रसास्वादन ले रहे हैं।
श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन मंगलवार 7 अप्रैल को कथावाचक श्री रामभद्राचार्य जी महाराज (हिमालयन बाबा) ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं से लेकर कंस वध और रुक्मिणी विवाह तक के प्रसंगों का भावपूर्ण और जीवंत वर्णन किया। खास बात कि रुक्मिणी विवाह के जीवंत वर्णन की वजह से कथा आधी रात लगभग साढ़े 12 बजे तक सुनायी गयी। कंस वध प्रसंग के समय तो जय श्री कृष्ण और विवाह प्रसंग के समय राधे-राधे के जयकारे से माहौल गूंज उठा। इसके पहले दाऊ बलराम और राजकुमारी रेवती का विवाह प्रसंग सुनाया गया।

कृष्ण – रुक्मिणी विवाह प्रसंग का अलौकिक नजारा। फोटो : मुखियाजी
सिंहपुर में कथा कहते हिमालयन बाबा श्री राम भद्राचार्य जी महाराज। फोटो : मुखियाजी

श्रीमद्भागवत कथा में सबसे अधिक आकर्षण रुक्मिणी विवाह प्रसंग का रहा, जहां कथा पंडाल में मानो साक्षात बारात उतर आयी हो। रुक्मिणी और भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य मिलन को कथावाचक ने इतनी मधुरता से प्रस्तुत किया कि पूरा वातावरण भक्तिरस में डूब गया। बारात स्वागत से लेकर शादी की सभी पारंपरिक रस्में मंच पर विधिवत निभायी गयीं। इस दौरान मांगलिक गालियों की परंपरा भी निभायी गयी, जिससे माहौल पूरी तरह जीवंत और लोक-संस्कृति से ओतप्रोत हो उठा। दूल्हे की गाल सेकाई रस्म लगभग घंटा भर चला। इसके बाद मांगलिक गालियों का दौर शुरू हुआ। कथा के दौरान बीच-बीच में भजनों की प्रस्तुति ने श्रद्धालुओं को झूमने पर मजबूर कर दिया।

इसी तरह, होली गीतों का प्रसंग शुरू होते ही नाथ स्थान का पूरा पंडाल मानो ब्रज की गलियों में बदल गया। कथावाचक श्री रामभद्राचार्य जी महाराज के फाग और होरी के मधुर स्वर पर श्रद्धालु ताली के लय पर खूब झूम रहे थे। खास कर महिलाएं तालियों की लय पर झूम रही थीं तो युवा रंग-रस में डूबे नजर आ रहे थे और बुजुर्ग भी भक्ति में सिर हिलाते हुए उत्साहित थे। कह सकते हैं कि होली के पारंपरिक गीतों की गूंज के बीच पूरा वातावरण रंग, भक्ति और उल्लास से सराबोर हो उठता है, मानो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण और राधा के संग होली खेली जा रही हो। लोगों ने बताया कि कथा के तीसरे दिन भी कुछ ऐसा ही माहौल था, जब भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। उस दिन भी प्रसंग आधी रात पार गया था। उस दिन की खास विशेषता यह रही कि जन्म के समय जहां कथा के दौरान मथुरा में आंधी-पानी बरस रहा तो ठीक एनवक्त पर खड़गपुर की धरती पर भी आंधी के साथ तेज बूँदाबांदी हो रही थी।

इसके अलावा कथावाचक श्री रामभद्राचार्य जी महाराज (हिमालयन बाबा) ने कालियानाग वध की कथा सुनाते हुए बताया कि किस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना को विषमुक्त कर ब्रजवासियों को भयमुक्त किया। इसके बाद कंस वध प्रसंग में अत्याचार पर धर्म की विजय का संदेश दिया गया, जिसे सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। आयोजन स्थल पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे, जिन्होंने कथा का श्रवण कर धर्म, भक्ति और संस्कृति के इस संगम का आनंद लिया। आयोजकों की ओर से व्यवस्था भी सुचारू रखी गयी, जिससे पूरे कार्यक्रम में अनुशासन और श्रद्धा का सुंदर समन्वय देखने को मिला। बता दें कि सुबह के सत्र में संतों की ओर से भजन प्रस्तुत किये जाते हैं, जबकि शाम के सत्र में संध्या 5 बजे से कथा शुरू होती है और रात 11 बजे आरती और प्रसाद वितरण के साथ इसका समापन होता है। विशेष प्रसंग में समय सीमा का पता नहीं चलता है और कब आधी रात निकल जाती है, इसका आभास तक नहीं होता है।