Mukhiyajee Reporter | Patna
बिहार में हर मौसम की अपनी अलग धार्मिक परंपरा है; कहीं डूबते-उगते सूर्य की आराधना होती है, तो कहीं चांद की भी उतनी ही श्रद्धा से पूजा की जाती है। हिंदू धर्म के अनुसार भादो माह में गणेश चतुर्थी के मौके पर होने वाली चंद्र-पूजा की बात ही निराली है, जो छठ जैसी आस्था और विधि-विधान से मनायी जाती है। बिहार के मिथिलांचल में इस मौके पर ‘पूजा के करबै ओरियान गै बहिना, चौरचन के चंदा सोहाओन’ गीत खूब गाया जाता है। इस बार यह पर्व आज 14 सितंबर (सोमवार) को मनाया जा रहा है। सोमवार भगवान भोलेनाथ का दिन है और इस दिन भगवान चंद्रदेव की पूजा करना अतिशुभ है।

मूलत: मिथिलांचल का पर्व है चौरचन : भादो शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेशोत्सव के साथ बिहार में चौरचन पर्व मनाया जाता है। मूल रूप से मिथिलांचल का यह पर्व चकचंदा या चौठ चांद के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन यह पर्व बिहार के अंग क्षेत्र में भी पूरी आस्था के साथ मनाया जाता है। अब तो यह दिल्ली सहित यूपी के बनारस और लखनऊ में भी मनाया जाता है। कहें तो यह पर्व उन शहरों में मनाया जाता है, जहां मिथिलांचल या अंगिका क्षेत्र के लोग रहते हैं। मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस शाम भगवान गणेश के साथ चांद की पूजा करते हैं, वे चंद्र दोष से मुक्त हो जाते हैं।
चांद को क्यों माना जाता है दोषी : कथा के अनुसार, इसी दिन चांद को दोष (कलंक) लगा था, इसीलिए पुराणों में इस दिन चांद को देखने की मनाही बतायी गयी है। यह पर्व बिल्कुल छठ व्रत जैसा ही है। बस अंतर इतना है कि छठ चार दिनों का पर्व है, जिसमें सूप में फल-फूल व पकवान सजाकर नदी किनारे सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, जबकि चौरचन में डलिया सजाकर आंगन या छत पर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे लोग झूठे कलंक से मुक्त हो जाते हैं।
कैसे होती है पूजा : चौरचन के दिन व्रती महिलाएं या पुरुष सुबह से शाम तक व्रत रखकर भक्ति में लीन रहते हैं। शाम को आंगन को गाय के गोबर से लीपकर (या आजकल सीमेंट के आंगन को पानी से धोकर) साफ किया जाता है। फ्लैट संस्कृति के इस दौर में अब यह पूजा छतों पर भी होने लगी है। साफ की गयी जगह पर केले के पत्ते की मदद से गोलाकार चांद बनाया जाता है, और डलिया को फल-फूल और खीर, मिठाई, गुजिया जैसे पकवानों से सजाया जाता है। इसके बाद पश्चिम दिशा की ओर मुख करके चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। कहीं-कहीं बिना अर्घ्य के भगवान चंद्रदेव को सीधे भोग लगाया जाता है, जिसमें दही शामिल होता है। पूजा के अंत में परिवार के सदस्य चंद्रमा के समक्ष शीश नवाकर सुख-समृद्धि, लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।

चतुर्थी को ही है भगवान गणेश का जन्मदिन : पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान गणेश अपने वाहन मूषकराज के साथ कैलाश पर भ्रमण कर रहे थे, तभी वहां पहुंचे चंद्रदेव उन्हें देखकर हंस पड़े। कारण पूछने पर चंद्रदेव ने कहा कि वे गणेश जी के विचित्र रूप पर हंस रहे थे। यह सुनकर गणेश जी क्रोधित हो गए और उन्हें शाप दे दिया- ‘तुम्हें अपने सौंदर्य पर बहुत अभिमान है, आज से तुम कुरूप हो जाओगे। जो भी इस दिन तुम्हें देखेगा, उस पर झूठा कलंक लगेगा और वह बिना अपराध किए भी अपराधी कहलाएगा।’ बाद में चंद्रमा के पश्चाताप करने पर गणेश जी ने उन्हें क्षमा तो कर दिया, पर शाप वापस नहीं ले सके। इसके बदले उन्होंने मुक्ति का उपाय बताया। कहा- ‘जो भादो शुक्ल चतुर्थी को चांद के साथ मेरी पूजा करेगा, उसे कलंक नहीं लगेगा।’ यही कारण है कि भादो शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को भगवान गणेश का जन्मदिन भी माना जाता है।
आइये जानते हैं चंद्रास्त का शुभ समय क्या है…
पटना – शाम 5:55 बजे से 7:40 बजे तक
मधुबनी – शाम 5:52 बजे से 7:36 बजे तक
सीतामढ़ी – शाम 5:54 बजे से 7:38 बजे तक
दरभंगा – शाम 5:52 बजे से 7:36 बजे तक
समस्तीपुर – शाम 5:52 बजे से 7:36 बजे तक
सहरसा – शाम 5:50 बजे से 7:34 बजे तक
मधेपुरा – शाम 5:49 बजे से 7:33 बजे तक
पूर्णिया – शाम 5:46 बजे से 7:31 बजे तक
कटिहार – शाम 5:46 बजे से 7:31 बजे तक
मुंगेर – शाम 5:50 बजे से 7:36 बजे तक
भागलपुर – शाम 5:48 बजे से 7:34 बजे तक
वाराणसी – शाम 6:03 बजे से 7:50 बजे तक
लखनऊ – शाम 6:12 बजे से 7:56 बजे तक
दिल्ली-एनसीआर – 08:15 बजे से 08:45 बजे तक








