Durga Puja 2026 : देवी सिर्फ मूर्ति नहीं, सृष्टि की चेतना हैं, आचार्य ब्रजेश मिश्र ने समझाया शिव-शक्ति के अद्वैत का रहस्य

Mukhiyajee Reporter | Patna

शारदीय नवरात्र की आज बुधवार को चौथी पूजा है। देवी के चौथे स्वरूप माँ कूषमांडा की आराधना की जा रही है। श्रद्धालु मंदिरों और घरों में देवी की उपासना कर रहे हैं। मदिरों में प्रतिमाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। वहीं वेदाचार्य एवं ज्योतिष दैवज्ञ आचार्य ब्रजेश मिश्र ने शाक्त दर्शन की गहराई की ओर ध्यान दिलाया है। उन्होंने कहा कि शाक्त परंपरा में देवी किसी मंदिर में स्थापित प्रतिमा भर नहीं हैं। वे सृष्टि की मूल चेतना, प्रकृति की क्रियाशीलता, जीवन की ऊर्जा और समस्त अस्तित्व के आधारभूत शक्ति-तत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इसलिए नवरात्र का असली संदेश केवल देवी के सामने दीप जलाना नहीं, बल्कि अपने भीतर विवेक, करुणा, साहस, संयम और सत्य का दीप जलाना भी है।

उन्होंने बताया कि शाक्त परंपरा में शक्ति को सृष्टि की मूल सामर्थ्य और देवी को परम तत्व माना गया है। अनेक शाक्त आगमों और तांत्रिक परंपराओं में शिव और शक्ति का अभिन्न संबंध है। शिव चेतना के प्रतीक हैं, जबकि शक्ति उस चेतना की अभिव्यक्ति और क्रियाशीलता की प्रतीक है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अलग-अलग दार्शनिक संप्रदाय इन तत्वों की व्याख्या अपने-अपने ढंग से करते हैं। इस दृष्टि से पूरा जगत शक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है। प्रकृति की गति, प्राणों का स्पंदन, विचारों का उदय, सृजन की क्षमता और परिवर्तन की अनिवार्यता, सबमें शक्ति-तत्व का चिंतन किया जाता है। देवी के स्वरूप के प्रतीकों पर उन्होंने कहा कि उनके हाथों में धारण अस्त्र-शस्त्र अन्याय के प्रतिरोध, अज्ञान के निवारण, धर्म की रक्षा और दुर्बल की सहायता के संकल्प का बोध कराते हैं। उनका सिंह निर्भीकता का और उनका तेज आत्मविश्वास का प्रतीक माना जा सकता है।

आचार्य मिश्र ने बताया कि माँ दुर्गा का महिषासुरमर्दिनी स्वरूप अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देता है, मातृस्वरूप करुणा सिखाता है और ज्ञानस्वरूप विवेक जगाता है। उनका उग्र स्वरूप याद दिलाता है कि धर्म की रक्षा के लिए कभी-कभी दृढ़ता भी जरूरी होती है। उन्होंने कहा कि शाक्त साधना का उद्देश्य केवल बाहरी सामर्थ्य पाना नहीं है। उसका गंभीर पक्ष अपने अहंकार को पहचानना, चित्त को अनुशासित करना और चेतना को निर्मल बनाना है। उनके अनुसार शक्ति का वास्तविक सम्मान तभी है, जब उसका उपयोग संरक्षण, कल्याण और धर्मसम्मत कर्मों के लिए हो। उन्होंने कहा कि माता की सच्ची आराधना वही है, जिसमें भक्ति से हृदय निर्मल हो, ज्ञान से बुद्धि प्रकाशित हो, साहस से कर्म समर्थ हों और करुणा से संसार अधिक मानवीय बने।

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